त्वरित लिंक्स
Civil services
1 views
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'संघ की न्यायपालिका' (The Union Judiciary - सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 124 से 147) तथा 'न्यायिक पुनरावलोकन' (Judicial Review) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 137 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि या उसके द्वारा दिए गए किसी आदेश या निर्णय का पुनरावलोकन करने की शक्ति प्राप्त है, बशर्ते इस शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब संसद इस आशय का कोई विशेष अधिनियम पारित करे।
- 2. 'न्यायिक पुनरावलोकन' की संकल्पना का प्रत्यक्ष उल्लेख मूल संविधान के अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 32 में स्पष्ट रूप से किया गया है, जिसके तहत उच्चतम न्यायालय को संघ या राज्यों के ऐसे किसी भी कानून को शून्य घोषित करने की शक्ति प्राप्त है जो संविधान के भाग III (मौलिक अधिकारों) का उल्लंघन करते हैं।
- 3. केशवानंद भारती वाद (1973) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि 'संविधान की सर्वोच्चता' और 'न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति' दोनों ही भारतीय संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) का अभिन्न अंग हैं, जिन्हें संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के तहत किए जाने वाले संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से भी समाप्त या छीना नहीं जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 137 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि या उसके द्वारा दिए गए निर्णयों का पुनरावलोकन करने की शक्ति स्वतः (Suo motu या नियमों के अधीन) प्राप्त है। इसके लिए संसद द्वारा किसी विशेष अधिनियम को पारित करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। यह न्यायालय की अपनी अंतर्निहित संवैधानिक शक्ति है।
कथन 2 सही है: भारतीय संविधान में 'न्यायिक पुनरावलोकन' (Judicial Review) शब्द का प्रत्यक्ष उपयोग भले ही सीधे तौर पर एक स्वतंत्र अनुच्छेद में न किया गया हो, किंतु अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ) और अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) प्रत्यक्ष रूप से न्यायालय को यह शक्ति प्रदान करते हैं कि वह असंवैधानिक कानूनों को रद्द कर सके।
कथन 3 सही है: ऐतिहासिक 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' वाद में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह प्रतिपादित किया था कि 'न्यायिक पुनरावलोकन' (Judicial Review), संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन और शक्ति का पृथक्करण आदि सिद्धांत संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) का हिस्सा हैं, और संसद अपनी संविधान संशोधन की शक्ति (अनुच्छेद 368) का प्रयोग करके भी इन्हें नष्ट नहीं कर सकती।
Related Questions
→
भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'महासागरीय लवणता' (Ocean Salinity) और इसे प्रभावित करने वाले कारकों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महासागरीय जल में घुले हुए लवणों की मात्रा को प्रति हजार ग्राम जल में विलीन लवण की ग्राम मात्रा (Parts Per Thousand - ppt) में व्यक्त किया जाता है, जिसमें सोडियम क्लोराइड (NaCl) की मात्रा सर्वाधिक होती है।
2. भूमध्य रेखा (Equator) से ध्रुवों (Poles) की ओर बढ़ने पर सामान्यतः महासागरीय लवणता में निरंतर कमी आती जाती है, क्योंकि उच्च अक्षांशों पर वाष्पीकरण की दर बहुत अधिक होती है और नदियाँ बड़े पैमाने पर मीठा जल जोड़ती हैं।
3. लाल सागर (Red Sea) और फारस की खाड़ी (Persian Gulf) जैसे अर्ध-बंद समुद्रों (Semi-enclosed Seas) में उच्च तापमान के कारण तीव्र वाष्पीकरण होता है, जिसके परिणामस्वरूप यहाँ की लवणता विश्व के खुले महासागरों के औसत मान से काफी अधिक पाई जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष कौन थे?
→
भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) की विधिक शक्तियों तथा अधिकारक्षेत्र के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 और 15 के तहत NGT को पर्यावरण से जुड़े उन सभी सिविल मामलों में न्यायनिर्णयन की व्यापक शक्ति प्राप्त है जो अधिनियम की अनुसूची I में सूचीबद्ध सात विशिष्ट पर्यावरण कानूनों (जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम आदि) के प्रवर्तन से संबंधित हैं।
2. 'सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' या NGT से जुड़े अन्य न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया गया है कि अधिकरण के पास पर्यावरण संबंधी मामलों में आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के मामलों को छोड़कर, अपने स्वयं के आदेशों, निर्देशों या निर्णयों की अवमानना के लिए सिविल अवमानना (Civil Contempt) के तहत दंडित करने की वही शक्ति प्राप्त है जो देश के उच्च न्यायालयों को होती है।
3. 'सेव मोनोआ बेसिन कमिटी बनाम भारत संघ' और अन्य मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि NGT के किसी भी आदेश या निर्णय के विरुद्ध सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने से पहले aggrieved party (व्यथित पक्षकार) को संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष रिट याचिका दायर करना एक अनिवार्य और पूर्ववर्ती शर्त (Condition Precedent) है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
"मौलिक अधिकारों का प्रहरी" (Guardian of Fundamental Rights) किसे कहा जाता है?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' और 'संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XX के अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी उपबंध का संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु इस प्रक्रिया के तहत संसद संविधान की किसी भी मूल विशेषता या मूल संरचना को निरस्त या नष्ट नहीं कर सकती है।
2. कुछ विशिष्ट संविधान संशोधनों (जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया, केंद्र और राज्यों की कार्यकारी शक्तियों का विस्तार, या सातवीं अनुसूची की कोई सूची) के लिए संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत के साथ-साथ देश के कुल राज्यों में से कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification) का होना अनिवार्य होता है।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति की कोई सीमा नहीं है और संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से को पूरी तरह से समाप्त कर सकती है, जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.