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Indian Polity
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संविधान सभा के अध्यक्ष?

Detailed Explanation

राजेंद्र प्रसाद।
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत विधानसभा और विधान परिषद के गठन, उनकी संरचना तथा विधान परिषद के उत्सादन (Abolition) और सृजन (Creation) की प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उसके उत्सादन के लिए विधि बना सकती है, बशर्ते कि संबंधित राज्य की विधानसभा इस आशय का एक संकल्प विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दे। 2. संविधान के अनुच्छेद 171 के प्रावधानों के तहत किसी राज्य की विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु यह भी अनिवार्य किया गया है कि किसी भी स्थिति में विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या चालीस से कम नहीं होनी चाहिए। 3. विधान परिषद की कुल संरचना का एक-तिहाई हिस्सा स्थानीय निकायों (जैसे नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों) के निर्वाचकों द्वारा चुना जाता है, एक-बारहवां हिस्सा उन स्नातकों द्वारा चुना जाता है जो उस राज्य के क्षेत्र में कम से कम तीन वर्ष से निवास कर रहे हों, और एक-तिहाई हिस्सा सीधे राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किया जाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या अन्य सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि किसी राज्य के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, तथा इनमें से किसी भी आयोग के आधे से अधिक सदस्यों के लिए यह अनिवार्य शर्त है कि उन्होंने नियुक्ति की तिथि से ठीक पहले भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन कम से कम दस वर्षों तक पद धारण किया हो। 2. संविधान के अनुच्छेद 317 के अंतर्गत लोक सेवा आयोग के किसी भी सदस्य या अध्यक्ष को केवल कदाचार के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है, और राष्ट्रपति के आदेश के लिए सर्वोच्च न्यायालय की संस्तुति आवश्यक होती है, बशर्ते राष्ट्रपति द्वारा ऐसा मामला जाँच के लिए उच्चतम न्यायालय को भेजा गया हो और न्यायालय ने अपनी जाँच के पश्चात हटाने की सलाह दी हो। 3. अनुच्छेद 321 के अनुसार, संसद या किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाई गई विधियों के माध्यम से क्रमशः संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग के कार्यों के दायरे को बढ़ाया जा सकता है, किंतु राज्य लोक सेवा आयोग के कृत्यों के दायरे को किसी भी परिस्थिति में राज्यपाल के अनुमोदन से संसद द्वारा विस्तारित नहीं किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनावी सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के खंड (2) के अनुसार निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (यदि कोई हों) से मिलकर बनेगा, और इनकी नियुक्ति संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा आयोग को सहायता प्रदान करने के लिए क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार भी संसद के पास सुरक्षित है। 2. वर्ष 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने 'इन्द्रजीत बरुवा बनाम भारत संघ' मामले के ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय प्रकृति में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के पास मतदान के अधिकारों के मामले में समान शक्तियाँ होती हैं, और किसी भी मतभेद की स्थिति में निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है, न कि केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सहमति से। 3. निर्वाचन आयोग के व्यय भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित (Charged) होते हैं, ठीक उसी तरह जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के वेतन व भत्ते होते हैं, ताकि आयोग की वित्तीय स्वायत्तता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों (अनुच्छेद 25-28) तथा उनसे संबंधित न्यायिक दृष्टांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन है, और इसके तहत राज्य को किसी भी धार्मिक आचरण से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य किसी लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निर्बंधन करने का पूर्ण अधिकार है। 2. अनुच्छेद 26 प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण करने, अपने धर्म के विषयों में कार्यों का प्रबंधन करने, तथा ऐसी संपत्ति के अर्जन, स्वामित्व और प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है, और यह अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष (Absolute) है, जिसे किसी भी विधि द्वारा राज्य के नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता है। 3. अनुच्छेद 27 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को ऐसे करों का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है जिनकी आय किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि या पोषण के लिए विशेष रूप से व्यय की जाती है, जिसका अर्थ यह है कि राज्य द्वारा किसी धार्मिक उद्देश्य के प्रोत्साहन के लिए वसूला जाने वाला शुल्क (Fee) या कर पूरी तरह से असंवैधानिक होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) की संरचना, वित्तीय स्वायत्तता और उनके क्रियान्वयन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 243-B के अनुसार सभी राज्यों में त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली की स्थापना करना अनिवार्य है, किंतु जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, उन्हें मध्यवर्ती (ब्लॉक) स्तर पर पंचायत के गठन न करने का विकल्प प्रदान किया गया है। 2. अनुच्छेद 243-H के अंतर्गत राज्य के विधानमंडल को यह शक्ति दी गई है कि वह विधि द्वारा पंचायतों को कुछ कर, शुल्क, टोल और फीस आरोपित करने, वसूलने और उन्हें अपने उपयोग के लिए विनियमित करने का अधिकार प्रदान कर सके, जिसका अर्थ यह है कि कराधान की शक्तियां पंचायतों को संविधान द्वारा स्वतः प्रदत्त (Self-executing) नहीं हैं बल्कि राज्य विधानमंडल के विवेक पर निर्भर करती हैं। 3. प्रत्येक राज्य में पंचायतों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार करने और उनके सभी चुनावों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करने की शक्ति केंद्रीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) में निहित होती है, जैसा कि अनुच्छेद 243-K में उपबंधित है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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