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BPSC TRE 4.0
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बिहार के भूवैज्ञानिक संरचना और मृदा तंत्र के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. दक्षिण बिहार के पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों में मुख्य रूप से लाल और पीली मिट्टी (Red and Yellow Soil) पाई जाती है, जो विंध्यन और धारवाड़ क्रम की प्राचीन चट्टानों के अपक्षय और विखंडन से विकसित हुई है तथा जिसमें नाइट्रोजन, ह्यूमस और फास्फोरस की मात्रा कम होती है।
  2. 2. उत्तर बिहार के मैदानी इलाकों में पाई जाने वाली नवीन जलोढ़ मिट्टी को 'खादर' कहा जाता है, जिसका विस्तार कोसी, गंडक और बागमती जैसी नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में है, और यह मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है क्योंकि इसमें प्रतिवर्ष बाढ़ के साथ नई उपजाऊ गाद का निक्षेपण होता है।
  3. 3. टाल क्षेत्र (Tal Region) जो कि पटना से मोकामा तक गंगा के दक्षिण में स्थित एक संकीर्ण जलमग्न द्रोणी है, की मृदा मुख्य रूप से भारी चिकनी मिट्टी (Heavy Clay) है, जिसे स्थानीय भाषा में 'केवल' या 'करेल-केवाल' मृदा कहा जाता है और यह धान की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है।
  4. 4. बिहार के उत्तर-पश्चिमी भाग (विशेषकर पश्चिम चंपारण के सोमेश्वर और दून घाटी क्षेत्र) में टर्शरी (Tertiary) युग की चट्टानों के ऊपर 'पर्वतीय एवं तराई मृदा' का विकास हुआ है, जिसमें अम्लीय प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है और यह गन्ने तथा धान के उत्पादन के लिए अनुकूल होती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए सभी कथन बिहार की चट्टानी संरचना और मृदा तंत्र के संबंध में पूर्णतः सत्य हैं। दक्षिण बिहार का पठार धारवाड़ और विंध्यन क्रम की चट्टानों से बना है जहाँ लाल-पीली मृदा मिलती है। उत्तर बिहार में नवीन जलोढ़ (खादर) मृदा पाई जाती है। टाल क्षेत्र की भारी चिकनी मिट्टी को 'करेल-केवाल' कहते हैं। पश्चिम चंपारण के तराई क्षेत्र में अम्लीय पर्वतीय मृदा का विकास हुआ है। इस प्रकार के विस्तृत और विश्लेषणात्मक अध्ययन के लिए बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पोर्टल पर विजिट करें।
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