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BPSC TRE 4.0
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मौर्य कालीन प्रशासनिक व्यवस्था तथा मौर्योत्तर कालीन आर्थिक एवं सामाजिक संरचना के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. मौर्य काल में 'तीर्थ' सर्वोच्च अधिकारी होते थे, जिनकी संख्या अर्थशास्त्र के अनुसार अठारह थी, और इनमें 'समहर्ता' आय के संग्रह और 'सनिदाता' राजकीय कोषागार के संरक्षक के रूप में कार्य करता था।
  2. 2. अशोक के शिलालेखों में न्याय व्यवस्था के संदर्भ में 'रज्जुक' अधिकारियों को ग्रामीण क्षेत्रों में भू-सर्वेक्षण और सीमांकन के साथ-साथ न्यायिक अधिकार भी प्रदान किए गए थे, जिससे वे ग्रामीण जनता पर दंड और पुरस्कार का निर्णय ले सकें।
  3. 3. मौर्योत्तर काल में सातवाहन शासकों ने सबसे पहले ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त भूमि (Agrahara grants) दान देने की प्रथा को बड़े पैमाने पर संस्थागत रूप दिया, जिससे सामंती प्रवृत्तियों का बीजारोपण हुआ।
  4. 4. कुषाण काल में अंतराष्ट्रीय व्यापार अपने चरम पर था, और इस काल में रोमन साम्राज्य के साथ भारी मात्रा में सोने के सिक्के (दीनार) भारत आए, जिसके जवाब में कुषाण शासक कनिष्क ने रोमन सिक्कों की तर्ज पर 'शुद्ध स्वर्ण मुद्राएँ' (Dinars) बड़े पैमाने पर जारी कीं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए सभी कथन पूर्णतः सत्य हैं। मौर्य काल में केंद्रीय प्रशासन कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' पर आधारित था जहाँ 18 तीर्थों (मंत्री/अधिकारियों) का उल्लेख मिलता है; 'समहर्ता' राजस्व संग्रह का प्रमुख तथा 'सनिदाता' कोषाध्यक्ष होता था। अशोक के चतुर्थ स्तंभ लेख के अनुसार 'रज्जुक' अधिकारियों को निष्पक्ष न्याय देने और दंडित करने के व्यापक अधिकार दिए गए थे। मौर्योत्तर काल में सातवाहन वंश ने भूमि अनुदान (Agrahara) की परंपरा को व्यापक रूप दिया। साथ ही, कुषाण काल में रोमन व्यापार के फलस्वरूप भारी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएँ (दीनार) प्रचलित हुईं। अधिक अभ्यास और अध्ययन सामग्रियों के लिए आप बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।
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