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भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) तथा संसद के उच्च सदन (राज्य सभा) की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह पद धारण करता है जो राष्ट्रपति को उचित लगे, तथा महान्यायवादी बनने के लिए वही योग्यता होनी चाहिए जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बनने के लिए आवश्यक होती है।
  2. 2. महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी समितियों की बैठकों में बोलने और भाग लेने का पूर्ण अधिकार है, किंतु उसे संसद के किसी भी सदन में मतदान करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
  3. 3. राज्य सभा एक स्थायी सदन है जिसका विघटन नहीं होता, और इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है, जिनमें से एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त होते हैं, और संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्य सभा में अधिकतम सदस्यों की संख्या 250 निर्धारित की गई है।
  4. 4. धन विधेयक (Money Bill) के मामले में राज्य सभा की शक्तियाँ लोकसभा की तुलना में पूर्णतः समान होती हैं, क्योंकि राज्य सभा किसी भी धन विधेयक को अस्वीकार कर सकती है या उसमें संशोधन कर सकती है, और लोकसभा के लिए राज्य सभा की सिफारिशों को मानना अनिवार्य होता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 3 पूर्णतः सत्य हैं। भारत के महान्यायवादी (अनुच्छेद 76) देश के सर्वोच्च विधि अधिकारी होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उन्हें संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्य सभा) में बोलने तथा भाग लेने का अधिकार तो है (अनुच्छेद 88), लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं है। राज्य सभा एक स्थायी निकाय है (अनुच्छेद 80) जिसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है और एक-तिहाई सदस्य हर दो साल पर सेवानिवृत्त होते हैं। कथन 4 असत्य है क्योंकि धन विधेयक के संबंध में लोकसभा की शक्ति सर्वोपरि होती है; राज्य सभा न तो धन विधेयक को अस्वीकार कर सकती है और न ही उसमें संशोधन कर सकती है, वह केवल अपनी सिफारिशें दे सकती है जिन्हें मानना लोकसभा के लिए बाध्यकारी नहीं है। अधिक अभ्यास के लिए बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पोर्टल पर विजिट करें।
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