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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की संरचना, उसकी अधिकारिता और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर परामर्श मांगने की शक्ति प्राप्त है जो लोक महत्व का हो, और इस अनुच्छेद के अधीन राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किए जाने पर उच्चतम न्यायालय अपनी राय राष्ट्रपति को देने के लिए पूरी तरह बाध्य है।
  2. 2. उच्चतम न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) से संबंधित विधि बनाने की पूर्ण शक्ति संसद में निहित है, और इसके तहत संसद ने 'न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971' पारित किया है, जिसके अंतर्गत दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार की अवमानना के लिए दंड का प्रावधान किया गया है।
  3. 3. संविधान की मूल संरचना (Basic Structure Doctrine) के सिद्धांत के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायिक समीक्षा की शक्ति को संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किए गए किसी भी संवैधानिक संशोधन के माध्यम से भी समाप्त या सीमित नहीं किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 143 के तहत यदि लोक महत्व का कोई प्रश्न राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय को परामर्श के लिए भेजा जाता है, तो उच्चतम न्यायालय अपनी राय देने के लिए केवल 'सहमति' रखता है (यदि मामला संविधान पूर्व की किसी संधि या समझौते से जुड़ा हो तो राय देना अनिवार्य हो सकता है, अन्यथा अन्य मामलों में वह राष्ट्रपति को परामर्श देने से मना भी कर सकता है और राष्ट्रपति उस राय को मानने के लिए भी बाध्य नहीं हैं)। कथन 2 सत्य है, क्योंकि भारतीय संसद को अनुच्छेद 129 और 142 के साथ विधायी शक्तियों के तहत न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 बनाने का अधिकार है। कथन 3 भी सत्य है, क्योंकि 'केशवानंद भारती वाद (1973)' और 'L.C. Golaknath वाद' से लेकर 'किश्वर प्रसाद वाद' तक यह स्थापित किया जा चुका है कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा है और इसे संसद द्वारा भी समाप्त नहीं किया जा सकता। अधिक जानने के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विस्तृत अध्ययन कर सकते हैं।
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