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Indian Polity
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भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की शक्तियों, कार्यप्रणाली और चुनाव सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान की गई है, तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही दुर्व्यवहार या असमर्थता के आधार पर समान प्रक्रिया और समान बहुमत से हटाया जा सकता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना नहीं हटाया जा सकता।
- 2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 135C के तहत मतदान के दिन और मतदान समाप्त होने के लिए निर्धारित समय से ठीक 48 घंटे पूर्व की अवधि के दौरान किसी भी होटल, भोजनालय, सराय या किसी अन्य सार्वजनिक या निजी स्थान पर शराब या अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री, वितरण या आपूर्ति पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है।
- 3. निर्वाचन आयोग की यह वैधानिक और संवैधानिक स्थिति है कि वह आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के उल्लंघन के मामलों में सीधे किसी राजनीतिक दल की मान्यता को रद्द करने या किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को संसद की सदस्यता से तुरंत अयोग्य घोषित करने की अंतिम न्यायिक शक्ति रखता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों (Election Commissioners) को राष्ट्रपति द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है, यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है, हालांकि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के परामर्श की प्रथा है। इसके अलावा, अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की 'सिफारिश' (Recommendation) का होना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, बल्कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सलाह पर ही उन्हें हटाया जाता है। कथन 2 बिल्कुल सही है; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 135C के अनुसार मतदान क्षेत्र में मतदान समाप्ति के लिए नियत समय से समाप्त होने वाले 48 घंटों की अवधि के दौरान मदिरा या अन्य मादक पदार्थों की बिक्री या वितरण प्रतिबंधित होता है। कथन 3 गलत है क्योंकि निर्वाचन आयोग के पास किसी राजनीतिक दल की मान्यता रद्द करने की अंतिम न्यायिक शक्ति या किसी सांसद/विधायक को सीधे अयोग्य घोषित करने का अधिकार नहीं है (दलबदल को छोड़कर अयोग्यता के मामले में राष्ट्रपति या राज्यपाल चुनाव आयोग की सलाह पर निर्णय लेते हैं, और दल की मान्यता का विवाद चुनाव आयोग तय करता है लेकिन उसकी समीक्षा न्यायालय कर सकते हैं)। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) में उल्लिखित विभिन्न आयामों और उससे संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की प्रस्तावना में 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' (Liberty, Equality and Fraternity) के आदर्शों को अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा से प्रेरित होकर अपनाया गया है, जबकि 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूसी क्रांति (1917) के प्रेरणास्त्रोत से लिया गया है।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'गोलकनाथ वाद' (1967) में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अनन्य और मूल भाग है, जिसमें संसद को अनुच्छेद 368 के तहत भी संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है।
3. 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है, इसलिए विधायिका इसमें संशोधन नहीं कर सकती, किंतु बाद में 'केशवानंद भारती वाद' (1973) में न्यायालय ने अपने इस दृष्टिकोण को बदलते हुए प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग स्वीकार किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 360' के अंतर्गत 'वित्तीय आपातकाल' (Financial Emergency) की घोषणा और उसके प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यदि राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व या साख खतरे में है, तो वह वित्तीय आपातकाल की उद्घोषणा कर सकता है।
2. वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने वाली उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तारीख से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, और लोकसभा के विघटन की स्थिति में यह उद्घोषणा कभी भी स्वतः समाप्त नहीं होती जब तक कि नया सदन इसका अनुमोदन न कर दे।
3. वित्तीय आपातकाल के दौरान, संघ की कार्यपालिका शक्ति के अंतर्गत भारत के सभी या किसी भी वर्ग के कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कमी करने के निर्देश दिए जा सकते हैं, तथा राज्यों के विचार के लिए आरक्षित रखे गए धन विधेयकों या अन्य वित्तीय विधेयकों पर राष्ट्रपति द्वारा विचार करने के विशेष निर्देश दिए जा सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान सभा के गठन, उसकी कार्यप्रणाली और निर्माण प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति (Proportional Representation by means of Single Transferable Vote) के माध्यम से किया गया था, जिसमें ब्रिटिश प्रांतों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आवंटित की गई थीं, और प्रत्येक दस लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि का चुनाव किया गया था।
2. संविधान सभा आंशिक रूप से चुनी हुई और आंशिक रूप से नामांकित (Partly elected and partly nominated) निकाय थी, क्योंकि रियासतों (Princely States) के प्रतिनिधियों का चयन संबंधित रियासतों के शासकों द्वारा किया जाना था, न कि जनता द्वारा निर्वाचित होकर आना था।
3. वर्ष 1946 में आयोजित संविधान सभा के चुनावों में मुस्लिम लीग ने भाग लिया था और उसे कुल सीटों में से भारी बहुमत प्राप्त हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग के असहयोग के कारण ही अंततः भारत के विभाजन और पाकिस्तान के लिए एक पृथक् संविधान सभा के गठन की मांग को स्वीकार करना पड़ा था।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधाई संबंधों और अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के प्रावधानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि किसी समय लोकहित में यह प्रतीत होता है कि अंतर-राज्यीय परिषद् का गठन किया जाना चाहिए, तो वह ऐसी परिषद् की स्थापना कर सकता है और उसके द्वारा किए जाने वाले कृत्यों, उसकी संरचना तथा पद्धति को परिभाषित कर सकता है, तथा इस परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना और उन पर सलाह देना है।
2. अनुच्छेद 249 के उपबंधों के अनुसार, यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी भी विषय पर विधि बना सकती है, तो संसद उस विषय पर संपूर्ण देश या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है।
3. प्रशासनिक संबंधों के अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद 257 के अनुसार प्रत्येक राज्य की कार्यकारी शक्ति का इस प्रकार प्रयोग किया जाएगा जिससे संघ की कार्यकारी शक्ति के प्रयोग में कोई बाधा न पड़े या उस पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, और संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार राज्यों को इस प्रयोजन के लिए आवश्यक निर्देश देने तक होता है कि वे अपने क्षेत्र में रेलमार्गों और संचार के साधनों के रखरखाव तथा उनके संरक्षण के लिए क्या कदम उठाएं।
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