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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग IV के अंतर्गत उल्लिखित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) तथा इनसे संबंधित संशोधनों और विधियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 43A के अनुसार राज्य, उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी को सुरक्षित करने के लिए उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीति से कदम उठाएगा, और इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था।
- 2. अनुच्छेद 45 के मूल पाठ में 6 वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का प्रावधान था, जिसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा इस अनुच्छेद से हटाकर अनुच्छेद 21A के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार बना दिया गया।
- 3. नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत आने वाले प्रावधान, यद्यपि देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में राज्य के लिए बाध्यकारी हैं, तथापि वे देश के किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए तत्व जोड़े गए थे, जिनमें अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी) भी शामिल है। कथन 2 गलत है: 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 से पहले अनुच्छेद 45 में 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान था। 86वें संशोधन के बाद, अनुच्छेद 21A के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया, तथा अनुच्छेद 45 को संशोधित करके '6 वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा' का उपबंध जोड़ा गया, न कि उसे हटाया गया। कथन 3 सही है: संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु वे किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (न्यायोचित) नहीं हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
Related Questions
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भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों की प्रकृति, उनके अपवादों और न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 13 न्यायिक समीक्षा का आधार प्रदान करता है, जिसके तहत संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई ऐसी कोई भी विधि जो मूल अधिकारों का अल्पीकरण करती है, शून्य (Void) होगी; किंतु सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार संविधान संशोधन अधिनियम (Constitutional Amendment Act) को अनुच्छेद 13 के अंतर्गत 'विधि' (Law) नहीं माना जा सकता और वे मूल अधिकारों को संशोधित करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं।
2. अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत सभी नागरिकों को कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु राज्य इस अधिकार के प्रयोग पर किसी पेशेवर या तकनीकी अर्g (Professional or Technical Qualifications) के आवश्यक होने या राज्य द्वारा किसी व्यापार, व्यवसाय या सेवा को पूर्णतः या भागतः अपने नियंत्रण में लेने के लिए कोई भी विधि बनाने से प्रतिबंधित नहीं है।
3. अनुच्छेद 21 के अंतर्गत 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण' का अधिकार नागरिकों के साथ-साथ विदेशियों को भी समान रूप से उपलब्ध है, तथा उच्चतम न्यायालय ने 'मेनका गांधी वाद' (1978) में यह स्पष्ट किया कि 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' (Procedure Established by Law) में प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांत, निष्पक्षता और औचित्य का समावेश होना अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) की नियुक्ति किस अनुच्छेद के तहत होती है?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रस्तावना में उल्लिखित 'आर्थिक न्याय' (Economic Justice) के आदर्श को वर्ष 1917 की रूसी क्रांति (Russian Revolution) से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया था, जिसका उद्देश्य धन, आय और संपत्ति की असमानता को दूर करना है।
2. 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग (Integral part) है, इसलिए संसद अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है।
3. प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्तियों का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तथा यह प्रकृति से गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) है, अर्थात् इसके प्रावधानों को न्यायालयों में लागू नहीं कराया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत विधानसभा और विधान परिषद की विधाई शक्तियों तथा उनकी आपसी अंतःक्रियाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार यदि विधान परिषद किसी सामान्य विधेयक को पारित करने से अस्वीकार कर देती है या उसमें ऐसे संशोधन करती है जिनसे विधानसभा सहमत नहीं है, तो विधानसभा द्वारा दोबारा पारित किए जाने पर भी विधान परिषद उसे अधिकतम चार महीने तक ही रोक सकती है (प्रथम बार तीन माह और पुनरीक्षण के पश्चात एक माह)।
2. धन विधेयक (Money Bill) को केवल विधानसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, और यदि विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक विधान परिषद को भेजा जाता है, तो विधान परिषद के पास न तो उसे अस्वीकार करने की शक्ति होती है और न ही उसमें संशोधन करने की; वह इसे अधिकतम चौदह दिनों की अवधि तक ही रोक सकती है।
3. राज्य के वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) पर राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों में सामान्य चर्चा होती है, किंतु अनुदान की मांगों पर मतदान (Voting on Demands for Grants) केवल विधानसभा के अधिकार क्षेत्र में आता है, विधान परिषद को अनुदान मांगों पर मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संसद का अधिवेशन कौन आहूत (Summon) करता है?
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