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Indian Polity
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSCs) की स्वतंत्रता, उनके सदस्यों की पदावधि, निष्कासन प्रक्रिया तथा उनके क्षेत्राधिकार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 317 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को केवल 'कदाचार' (Misbehavior) के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है, और कदाचार के इस आरोप की जाँच उच्चतम न्यायालय द्वारा की जाती है, जिसकी सलाह राष्ट्रपति के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होती है।
- 2. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य का कार्यकाल अपने पद ग्रहण करने की तिथि से 6 वर्ष की अवधि या 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक (जो भी पहले हो) होता है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष की अवधि या 62 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक होता है।
- 3. अनुच्छेद 320 के अंतर्गत लोक सेवा आयोगों से परामर्श करना सभी मामलों में अनिवार्य है, और यदि सरकार आयोग की सलाह के विरुद्ध कोई निर्णय लेती है, तो उस निर्णय को संसद या राज्य विधानमंडल के समक्ष स्पष्टीकरण के साथ रखना संवैधानिक रूप से अनिवार्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 317 के अनुसार, 'कदाचार' के आधार पर यूपीएससी या राज्य लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को हटाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा मामला उच्चतम न्यायालय को भेजा जाता है, और उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई जाँच के पश्चात यदि वह हटाने की सिफारिश करता है, तो राष्ट्रपति के लिए उस सलाह को मानना अनिवार्य होता है; किंतु इसके अलावा दिवालिया होना, अपने पद के कार्यकाल के दौरान किसी अन्य लाभ के पद पर कार्य करना या शारीरिक/मानसिक अशक्तता के आधार पर भी राष्ट्रपति उन्हें हटा सकता है। इसके अलावा, राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, किंतु उन्हें हटाने की शक्ति केवल राष्ट्रपति में निहित होती है।
कथन 2 सत्य है क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है।
कथन 3 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 320 के तहत आयोग से परामर्श करना कुछ विशेष मामलों में (जैसे सिविल सेवाओं में भर्ती की पद्धतियों से संबंधित विषयों पर) आवश्यक तो है, किंतु आयोग द्वारा दी गई सलाह 'सलाहकारी प्रकृति' (Advisory) की होती है और यह सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होती है। साथ ही, यदि सरकार आयोग की सलाह नहीं मानती है, तो इसके लिए संविधान में यह अनिवार्य नहीं किया गया है कि उसे संसद या विधानमंडल के समक्ष स्पष्टीकरण रखना ही होगा (यह एक परंपरा या नियम हो सकता है किंतु पूर्णतः संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है)। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
कथन 2 सत्य है क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है।
कथन 3 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 320 के तहत आयोग से परामर्श करना कुछ विशेष मामलों में (जैसे सिविल सेवाओं में भर्ती की पद्धतियों से संबंधित विषयों पर) आवश्यक तो है, किंतु आयोग द्वारा दी गई सलाह 'सलाहकारी प्रकृति' (Advisory) की होती है और यह सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होती है। साथ ही, यदि सरकार आयोग की सलाह नहीं मानती है, तो इसके लिए संविधान में यह अनिवार्य नहीं किया गया है कि उसे संसद या विधानमंडल के समक्ष स्पष्टीकरण रखना ही होगा (यह एक परंपरा या नियम हो सकता है किंतु पूर्णतः संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है)। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के क्रम में 'चार्टर अधिनियम, 1793' (Charter Act of 1793) और 'चार्टर अधिनियम, 1813' (Charter Act of 1813) के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चार्टर अधिनियम, 1793 के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को भारत में अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया, तथा यह भी प्रावधान किया गया कि नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) के सदस्यों और उनके कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व (Indian Revenues) से ही दिया जाएगा।
2. चार्टर अधिनियम, 1813 ने भारत में कंपनी के चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर अन्य सभी व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया, तथा पहली बार भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रति वर्ष 1 लाख रुपये की राशि खर्च करने का वैधानिक प्रावधान किया गया।
3. चार्टर अधिनियम, 1813 के द्वारा भारत में ईसाई मिशनरियों को आकर लोगों को प्रबुद्ध करने और धर्म प्रचार करने की अनुमति दी गई, और साथ ही ब्रिटिश नागरिकों तथा कंपनियों के लिए भारत के साथ व्यापार को पूरी तरह से प्रतिबंधित रखा गया जिसमें कोई छूट नहीं दी गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका (राज्यपाल और मुख्यमंत्री) की शक्तियों, कृत्यों और उनके संवैधानिक अंतर्संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा, और राज्यपाल द्वारा अपने स्वविवेक से किए जाने वाले कृत्यों को छोड़कर अन्य कृत्यों के निर्वहन में इस सलाह के अनुसार कार्य करना अनिवार्य है, तथा राज्यपाल द्वारा दी गई सलाह की किसी न्यायालय में जाँच की जा सकती है।
2. राज्य के महाधिवक्ता (Advocate-General) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, तथा उसे राज्य की विधानसभा या विधानपरिषद की बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
3. अनुच्छेद 167 के अनुसार मुख्यमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे और राज्यपाल द्वारा माँगी गई ऐसी जानकारी दे, तथा यदि राज्यपाल ऐसा अपेक्षा करे तो किसी ऐसे विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है, किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, परिषद के समक्ष विचार के लिए रखे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है, किंतु उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श लेना अनिवार्य संवैधानिक शर्त है।
2. अनुच्छेद 233 के अंतर्गत जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है, और जिला न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायिक सेवा के सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात नियमों के अनुसार की जाती है।
3. संविधान के अनुच्छेद 235 के अनुसार जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण (जिसमें posting, promotion और छुट्टी देना शामिल है) का अधिकार निहित रूप से संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यकारी और वीटो शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कोई विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह अपनी अनुमति रोक सकता है (अत्यंतिक वीटो), किंतु यदि संसद उस विधेयक को (धन विधेयक को छोड़कर) संशोधन के बिना या सहित पुनः साधारण बहुमत से पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति के लिए उस पर अपनी अनुमति देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाता है।
2. राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश (Ordinance) की शक्ति अनुच्छेद 123 के अंतर्गत उसकी विधायी शक्ति का हिस्सा है, और सर्वोच्च न्यायालय के 'डेको वासुदेव रेड्डी वाद' या अन्य स्थापित निर्णयों के अनुसार, अध्यादेश निर्माण की संतुष्टि न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है और इसे किसी भी न्यायालय में दुर्भावना के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (अनुच्छेद 72) के अंतर्गत राज्यपाल की तुलना में दो अतिरिक्त शक्तियां प्राप्त हैं - पहली यह कि वह सेना के न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड या डंडादेश को क्षमा कर सकता है, और दूसरी यह कि वह मृत्युदंड (Death Sentence) के मामलों में भी संपूर्ण क्षमादान दे सकता है, जबकि राज्य का राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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मौलिक अधिकार कहाँ से लिए गए?
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