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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राजभाषा, राजनीतिक दलों की मान्यता तथा संविधान की अनुसूचियों और भागों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिंदी है, और संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए जाने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा, किंतु संसद को विधि द्वारा यह शक्ति दी गई है कि वह 15 वर्ष की अवधि के बाद भी अंग्रेजी भाषा के निरंतर प्रयोग के लिए उपबंध कर सके।
- 2. संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के अंतर्गत किसी सदस्य की अयोग्यता से संबंधित विवाद पर निर्णय लेने की अंतिम शक्ति संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) में निहित होती है, और वर्ष 1992 के 'किहोटो होलोहन वाद' (Kihoto Holohan case) में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि पीठासीन अधिकारी का यह निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर है और इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- 3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) द्वारा राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु निर्वाचन आयोग के पास किसी पंजीकृत राजनीतिक दल की मान्यता या उसका चुनाव चिन्ह रद्द करने की कोई संविधित (statutory) शक्ति प्राप्त नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 343 के तहत संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिंदी और अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप निर्धारित किया गया है। इसके साथ ही मूल रूप से यह व्यवस्था थी कि अंग्रेजी का प्रयोग केवल 15 वर्षों तक (26 जनवरी 1965 तक) किया जाएगा, किंतु संसद ने 'राजभाषा अधिनियम, 1963' पारित करके अंग्रेजी के निरंतर प्रयोग को प्रशासनिक और विधायी कार्यों के लिए अनिश्चितकाल तक वैध बना दिया। कथन 2 गलत है: 'किहोटो होलोहन वाद' (1992) में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची के तहत पीठासीन अधिकारी के निर्णय को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि पीठासीन अधिकारी इस मामले में एक न्यायाधिकरण (tribunal) के रूप में कार्य करता है, अतः उसके निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। कथन 3 गलत है: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के अंतर्गत राजनीतिक दलों का पंजीकरण निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है, और निर्वाचन आयोग को कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, धोखाधड़ी आदि) में राजनीतिक दलों के पंजीकरण को रद्द करने की शक्ति प्राप्त नहीं है, किंतु चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के तहत चुनाव चिन्ह से संबंधित मामलों में उसे व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर अध्ययन करें।
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक स्वरूप, उनके विशेषाधिकारों और उनके कार्यालयों की कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के प्रावधान के अनुसार महान्यायवादी को अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, और उसे किसी भी ऐसे मामले में जिसमें भारत सरकार को परामर्श देना हो, आपराधिक मामलों में भी बिना सरकार की अनुमति के निजी प्रैक्टिस करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 149 के अंतर्गत नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) केवल केंद्र सरकार की प्राप्तियों और व्ययों की लेखा-परीक्षा करने के लिए अधिकृत है, तथा राज्यों के लेखाओं की परीक्षा करने का अधिकार पूरी तरह से संबंधित राज्यों के अपने लेखा परीक्षकों के पास होता है, जिसका संसद की विधि से कोई संबंध नहीं है।
3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा तैयार की गई केंद्र के विनियोग लेखाओं (Appropriation Accounts) और वित्त लेखाओं (Finance Accounts) से संबंधित लेखा-परीक्षा रिपोर्टों को राष्ट्रपति द्वारा संसद के प्रत्येक सदन के पटल पर रखवाया जाता है, जहाँ संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) द्वारा इन रिपोर्ट्स की गहन संवीक्षा की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राजभाषा, राजनीतिक दलों की मान्यता तथा संविधान की विभिन्न अनुसूचियों और भागों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्रवाइयां अंग्रेजी भाषा में ही होंगी, जब तक कि संसद विधि द्वारा कोई अन्य प्रावधान न करे, और किसी भी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस राज्य के उच्च न्यायालय की कार्रवाइयों में हिंदी या किसी अन्य राजभाषा के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकता है।
2. संविधान की नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, और इसके तहत यह प्रावधान किया गया कि इस अनुसूची में शामिल किए गए विधियों को इस आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जा सकता कि वे किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं, किंतु उच्चतम न्यायालय के 'केशवानंद भारती मामले' (1973) के निर्णय के पश्चात 24 अप्रैल 1973 के बाद इस अनुसूची में शामिल कानूनों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है यदि वे संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करते हैं।
3. दलबदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) के अंतर्गत किसी राजनीतिक दल के 'विलय' (Merger) की वैधता के लिए यह संवैधानिक आवश्यकता है कि मूल राजनीतिक दल के कम से कम आधे (50%) सदस्य विलय के पक्ष में हों, अन्यथा उन सभी सदस्यों को दलबदल के आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (पार्डनिंग पावर) और उसकी न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध भी क्षमादान देने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्यपाल की अनुच्छेद 161 के अंतर्गत प्रदत्त क्षमादान शक्ति से अधिक व्यापक है, क्योंकि राज्यपाल के पास सैन्य न्यायालय के दंड के विरुद्ध क्षमादान की कोई शक्ति नहीं है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के 'ईश्वर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' एवं 'केहर सिंह वाद' में यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया गया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रयोग करते समय उसे मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं किया गया है, और राष्ट्रपति अपनी पूर्ण स्वविवेक शक्ति (Absolute Discretion) के आधार पर दया याचिका पर निर्णय ले सकता है।
3. 'एरुमागुडा अप्पाराव वाद' और अन्य न्यायिक निर्णयों के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 72 के तहत दया याचिका पर निर्णय लेने में अत्यधिक और अकारण विलंब (Inordinate Delay) किए जाने की स्थिति में, न्यायपालिका उसकी इस प्रशासनिक कार्यवाई की न्यायिक समीक्षा कर सकती है और विलंब के आधार पर मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - Article 36-51) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 44 में 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) का प्रावधान किया गया है, जिसका उद्देश्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुनिश्चित करना है, और यह प्रावधान देश के किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वतः प्रवर्तनीय (Self-enforceable) है।
2. अनुच्छेद 48A के अनुसार राज्य देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा, जिसे वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में जोड़ा गया था।
3. अनुच्छेद 50 के अंतर्गत राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए राज्य कदम उठाएगा, ताकि शासन के अंगों में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन बना रहे।
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संविधान सभा का गठन किस मिशन से?
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