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Indian Polity
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भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग एक स्थायी और स्वतंत्र निकाय है, जिसकी संरचना मूल रूप से एक सदस्यीय थी, किंतु 1989 के पश्चात इसे राष्ट्रपति द्वारा एक बहु-सदस्यीय निकाय में परिवर्तित कर दिया गया जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं।
- 2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के वेतन और भत्ते सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होते हैं, किंतु निर्णय लेते समय यदि मतों में भिन्नता हो, तो बहुसंख्यक मत का नियम लागू होता है जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास किसी भी परिस्थिति में निर्णायक मत (Veto) का विशेष संवैधानिक अधिकार होता है।
- 3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और ऐसे अन्य निर्वाचन आयुक्तों से मिलकर बनेगा, जिनकी संख्या राष्ट्रपति समय-समय पर तय करते हैं। मूलतः यह एक सदस्यीय निकाय था, जिसे पहली बार 1989 में और फिर स्थायी रूप से 1993 में बहु-सदस्यीय बनाया गया। कथन 2 गलत है: बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की शक्तियां समान होती हैं और वेतन भी समान होते हैं। यदि किसी मामले पर मतभेद होता है, तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है, न कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास किसी प्रकार की 'वीटो' शक्ति होती है। कथन 3 सही है: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान (महाभियोग जैसी कठिन प्रक्रिया) है, और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा नहीं हटाया जा सकता है ताकि आयोग की स्वतंत्रता बनी रहे। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल का अध्ययन करें।
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के प्रावधानों और उससे संबंधित संवैधानिक उपबंधों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के तहत अनुच्छेद 243-ख में यह उपबंध किया गया है कि प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तरों पर पंचायतों का गठन किया जाएगा, किंतु जिन राज्यों की जनसंख्या बीस लाख से अधिक नहीं है, उन्हें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन करने की छूट दी गई है।
2. संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों की शक्तियों, प्राधिकार और उत्तरदायित्वों से संबंधित कुल 25 विषयों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है, जिसमें कृषि, भूमि सुधार, लघु सिंचाई, और खादी तथा कुटीर उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।
3. प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों में से कम-से-कम एक-तिहाई (33 प्रतिशत) स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे, और यह आरक्षण अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की कुल संख्या के संदर्भ में भी लागू होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना, अधिकारिता तथा शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ किसी अन्य प्रयोजन के लिए भी रिट (Writs) जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और उच्च न्यायालय का यह रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट अधिकार क्षेत्र की तुलना में अधिक व्यापक है।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और प्रमोशन संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात ही किए जाते हैं, तथा राज्यपाल इस प्रक्रिया में उच्च न्यायालय की सलाह मानने के लिए विधिक रूप से बाध्य नहीं होता है।
3. जिला न्यायालय से भिन्न अधीनस्थ न्यायालयों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा, राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय के नियमों के परामर्श से, राज्य न्यायिक सेवा के सदस्यों में से की जाती है।
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संसद का अधिवेशन कौन आहूत (Summon) करता है?
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भारतीय संविधान के भाग IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 44 पूरे देश के लिए 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) प्राप्त करने का प्रयास करने का निर्देश देता है, जो गोवा राज्य को छोड़कर पूरे भारत में तत्कालीन रूप से लागू है क्योंकि गोवा में पुर्तगाली सिविल कोड पहले से अस्तित्व में था।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए निर्देश जोड़े गए, जिनमें अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता), अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी) और अनुच्छेद 48A (पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा) शामिल हैं।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने कई प्रकरणों (जैसे 'मिनर्वा मिल्स वाद', 1980) में यह प्रतिपादित किया है कि मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है, और किसी भी स्थिति में नीति निर्देशक तत्वों को प्रभावी करने के लिए अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 के मूल अधिकारों को पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सकता।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की विभिन्न शक्तियों, अधिकार क्षेत्र और संविधान के निर्वाचन से संबंधित उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 137 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को अपनी स्वयं की दी गई किसी निर्णय या आदेश की पुनरावलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि या अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए ही न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 143 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा विधि या तथ्य के किसी व्यापक लोक महत्व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगे जाने पर, न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को अपनी राय देना अनिवार्य होता है, और उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई यह सलाह राष्ट्रपति पर प्रत्येक स्थिति में पूर्ण रूप से बाध्यकारी (Binding) होती है।
3. संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित किया गया विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर (Binding) होता है, जिसका तात्पर्य यह है कि यह निर्णय न्यायपालिका के अधीनस्थ न्यायालयों के साथ-साथ स्वयं उच्चतम न्यायालय पर भी पूर्ववर्ती निर्णयों के रूप में सर्वथा लागू होता है, जब तक कि एक बड़ी पीठ द्वारा इसे उलट न दिया जाए।
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