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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान का अनुच्छेद 16(4A) राज्य को किसी भी वर्ग के नागरिकों के पक्ष में राज्य के अधीन सेवाओं में ऐसे पदों के लिए आरक्षण के लिए उपबंध करने की शक्ति देता है, जो राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं, और इसे 77वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 द्वारा जोड़ा गया था।
- 2. अनुच्छेद 20(3) के अनुसार किसी भी अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति को अपने ही विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य (Self-incrimination) नहीं किया जा सकता, और यह सुरक्षा केवल न्यायालयीन कार्यवाहियों तक ही सीमित है, जबकि प्रशासनिक जाँच या विभागीय पूछताछ के दौरान यह अधिकार लागू नहीं होता है।
- 3. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय जाने के अधिकार को एक मूल अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट जारी कर सकता है, तथा राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: 77वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 द्वारा अनुच्छेद 16 में खंड (4A) जोड़ा गया, जो राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में पदोन्नति में आरक्षण के लिए उपबंध करने की शक्ति प्रदान करता है।
कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 20(3) के तहत 'स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संरक्षण' का अधिकार केवल आपराधिक न्यायालयीन कार्यवाहियों और औपचारिक जाँच तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी भी ऐसी कानूनी या आधिकारिक जाँच पर भी लागू होता है जहाँ किसी व्यक्ति को अपराध के लिए अभियुक्त बनाया गया हो, किंतु यह विभागीय पूछताछ या प्रशासनिक जाँच (जहाँ आपराधिक प्रकृति का मामला न हो) पर पूरी तरह लागू नहीं होता, तथापि व्यापक अर्थ में इसकी सीमाएं न्यायिक और अर्ध-न्यायिक दोनों प्रकार की कार्यवाहियों तक विस्तृत हैं।
कथन 3 सही है: अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मूल अधिकार है (डॉ. अंबेडकर ने इसे संविधान का 'हृदय और आत्मा' कहा था)। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय पाँच प्रकार की रिट जारी करता है। साथ ही, 44वें संविधान संशोधन, 1978 के बाद से अनुच्छेद 359 के तहत भी यह प्रावधान है कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 के अंतर्गत मिलने वाले अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता।
भारतीय संविधान के इस महत्वपूर्ण भाग के बारे में अधिक विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।
कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 20(3) के तहत 'स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से संरक्षण' का अधिकार केवल आपराधिक न्यायालयीन कार्यवाहियों और औपचारिक जाँच तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी भी ऐसी कानूनी या आधिकारिक जाँच पर भी लागू होता है जहाँ किसी व्यक्ति को अपराध के लिए अभियुक्त बनाया गया हो, किंतु यह विभागीय पूछताछ या प्रशासनिक जाँच (जहाँ आपराधिक प्रकृति का मामला न हो) पर पूरी तरह लागू नहीं होता, तथापि व्यापक अर्थ में इसकी सीमाएं न्यायिक और अर्ध-न्यायिक दोनों प्रकार की कार्यवाहियों तक विस्तृत हैं।
कथन 3 सही है: अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मूल अधिकार है (डॉ. अंबेडकर ने इसे संविधान का 'हृदय और आत्मा' कहा था)। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय पाँच प्रकार की रिट जारी करता है। साथ ही, 44वें संविधान संशोधन, 1978 के बाद से अनुच्छेद 359 के तहत भी यह प्रावधान है कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 के अंतर्गत मिलने वाले अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता।
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राज्य में 'संवैधानिक तंत्र की विफलता' पर राष्ट्रपति शासन किस अनुच्छेद में है?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के संवैधानिक उपबंधों तथा उनकी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 71 के अनुसार राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से उत्पन्न या उससे संबंधित सभी शंकाओं और विवादों की जाँच और विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाएगा और उसका निर्णय अंतिम होगा, तथा यदि किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया जाता है, तो उसके द्वारा अपने पद के कर्तव्यों के निष्पादन में उस घोषणा की तारीख से पूर्व किए गए कार्य अवैध हो जाते हैं।
2. संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति को उसके कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा, और राष्ट्रपति इस सलाह के अनुसार कार्य करेगा; किंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह प्रावधान जोड़ा गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से ऐसी सलाह पर 'पुनर्विचार' करने के लिए कह सकता है और राष्ट्रपति ऐसे पुनर्विचार के पश्चात दी गई सलाह के अनुसार ही कार्य करेगा।
3. अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका विधिक और संवैधानिक निहितार्थ यह है कि मंत्रिमंडल का प्रत्येक निर्णय पूरी मंत्रिपरिषद का निर्णय माना जाता है और यदि लोकसभा में मंत्रिपरिषद के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो प्रधानमंत्री सहित सभी मंत्रियों को त्यागपत्र देना पड़ता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण तथा मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के संबंधों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अंतर्गत राज्यपाल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्य विधानमंडल के विश्राम काल में प्रयोग की जाती है, किंतु राज्यपाल अपनी इस विधाई शक्ति का प्रयोग बिना मंत्रिपरिषद की सलाह के अपने स्वविवेक से किसी भी समय कर सकता है, बशर्ते राष्ट्रपति के निर्देश की आवश्यकता न हो।
2. राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के पुनः समवेत होने पर उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है, और यदि विधानमंडल उस अध्यादेश को अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित कर देता है या उसकी समयावधि (छह सप्ताह) समाप्त हो जाती है, तो वह निष्प्रभावी हो जाता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 167 के अनुसार मुख्यमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय और विधान के लिए प्रस्ताव राज्यपाल को संसूचित करे तथा राज्यपाल द्वारा माँगी गई ऐसी सूचना प्रदान करे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के राष्ट्रपति की कार्यकारी और विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 77 के अनुसार भारत सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई औपचारिक रूप से राष्ट्रपति के नाम से की हुई अभिव्यक्त की जाएगी, और राष्ट्रपति के नाम से बनाए गए और निष्पादित आदेशों तथा अन्य उपकरणों को ऐसे नियमों द्वारा प्रमाणित किया जाएगा जो राष्ट्रपति द्वारा बनाए जाएंगे, तथा इस प्रकार प्रमाणित किसी आदेश या instrument की विधि-मान्यता को इस आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जा सकता है कि वह राष्ट्रपति द्वारा किया गया या निष्पादित आदेश नहीं है।
2. संविधान के अनुच्छेद 85 के अंतर्गत राष्ट्रपति को समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर, जो वह ठीक समझे, सत्र के लिए आहूत करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु इसके लिए यह संवैधानिक अनिवार्यता है कि संसद के दो सत्रों के बीच की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की पहली बैठक के बीच छह मास से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।
3. राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आहूत करने की शक्ति प्राप्त है, और जब राष्ट्रपति संयुक्त बैठक आहूत करने के अपने आशय की सूचना संसद को दे देता है, तब लोकसभा के विघटन के बावजूद वह संयुक्त बैठक अपनी निर्धारित तिथि पर आहूत होगी और उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
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भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद 'सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही निर्णयों का पुनरावलोकन' करने की शक्ति देता है?
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