त्वरित लिंक्स
Indian Polity
25 views
भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों तथा अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति को 'अंतर-राज्यीय परिषद्' की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और इस परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना, ऐसे विषयों पर सलाह देना जिनमें राज्यों के समान हित हों, तथा नीतिगत समन्वय पर विचार करना है, किंतु इस परिषद् के निर्णय न्यायालय के आदेश की तरह अंतिम और बाधक (Binding) प्रकृति के नहीं होते हैं।
- 2. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission) की संस्तुति के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अंतर-राज्यीय परिषद् को एक स्थायी निकाय के रूप में स्थापित किया गया था, और इस परिषद् के अध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री होते हैं, जबकि सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके स्थायी सदस्य होते हैं।
- 3. अनुच्छेद 258 के अंतर्गत राष्ट्रपति, किसी राज्य की सरकार की सहमति से, उस सरकार या उसके अधिकारियों को संघ की कार्यकारी शक्ति के अंतर्गत आने वाले किसी विषय पर ऐसे कृत्य सौंप सकता है जो विशुद्ध रूप से केंद्रीय विषयों से संबंधित हों, किंतु ऐसा करने के लिए संसद द्वारा उस विषय पर एक विशेष कानून पारित किया जाना अनिवार्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार राष्ट्रपति अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना कर सकते हैं। यह निकाय मुख्य रूप से एक परामर्शदात्री (Advisory) संस्था है जो राज्यों के बीच विवादों और सामान्य हितों के विषयों पर विचार करती है, और इसके निर्णय बाध्यकारी नहीं होते हैं। कथन 2 सही है क्योंकि सरकारी आयोग की सिफारिश पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश से अंतर-राज्यीय परिषद् का गठन किया गया था, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होते हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 258 के तहत राष्ट्रपति द्वारा राज्य सरकार की सहमति से कृत्यों को सौंपने के लिए संसद द्वारा किसी नए कानून का पारित किया जाना अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह कार्य राष्ट्रपति के प्रशासनिक आदेश के माध्यम से भी किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
Related Questions
→
भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों (Emergency Provisions) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 352 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति संपूर्ण देश में या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा केवल तभी कर सकता है जब 'युद्ध', 'बाह्य आक्रमण' या 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) विद्यमान हो।
2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 352 में 'आंतरिक अशांति' शब्द को हटाकर उसके स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) शब्द को प्रतिस्थापित किया गया, तथा यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) अपनी लिखित सिफारिश राष्ट्रपति को संसूचित करे।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के उद्घोषणा के दौरान संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं, किंतु 44वें संशोधन के पश्चात यह स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को किसी भी परिस्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल (विधानसभा और विधान परिषद) की वित्तीय एवं विधायी शक्तियों तथा धन विधेयक (Money Bill) की प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 198 के अनुसार धन विधेयक केवल राज्य विधानसभा में ही पुनरस्थापित किया जा सकता है, विधान परिषद में नहीं, और जब विधानसभा द्वारा कोई धन विधेयक पारित करके विधान परिषद के पास भेजा जाता है, तो विधान परिषद को उसे अधिक से अधिक चौदह दिनों की अवधि के भीतर अपनी सिफारिशों के बिना या सिफारिशों सहित विधानसभा को वापस करना होता है।
2. यदि राज्य विधान परिषद निर्धारित चौदह दिनों की अवधि के भीतर धन विधेयक को विधानसभा को वापस नहीं करती है, या विधानसभा विधान परिषद की सभी या किसी भी सिफारिश को अस्वीकार कर देती है, तो वह धन विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित समझा जाता है जिस रूप में वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था, और इसके लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाने का कोई प्रावधान विधानमंडल के स्तर पर नहीं है।
3. राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी साधारण विधेयक (Ordinary Bill) को विधान परिषद अधिकतम चार महीने (प्रथम बार में तीन महीने और दूसरी बार में एक महीने) तक रोक सकती है, और यदि विधान परिषद विधेयक को अस्वीकार कर देती है या ऐसा संशोधन करती है जो विधानसभा को स्वीकार्य नहीं है, तो गतिरोध को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 197 के तहत राज्यपाल द्वारा विधानमंडल के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आहूत की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
अनुच्छेद 110 क्या है?
→
भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत भारतीय नागरिकता के अर्जन, समाप्ति तथा नागरिकता संबंधी संसद की विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 11 के अनुसार संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति के तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संपूर्ण शक्ति प्राप्त है, और इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 अधिनियमित किया था।
2. भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नागरिकता प्राप्त करने के कुल पाँच तरीके बताए गए हैं—जन्म से, वंश द्वारा, पंजीकरण द्वारा, देशीयकरण द्वारा और भारत क्षेत्र के समामेलन द्वारा, तथा इस अधिनियम में अब तक किए गए संशोधनों के बावजूद इनमें से किसी भी तरीके को कभी समाप्त नहीं किया गया है।
3. यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो संविधान के अनुच्छेद 9 के प्रावधान के अनुसार उसकी भारत की नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है, किंतु इस संदर्भ में अंतिम निर्णय लेने की शक्ति केवल संबंधित राज्य सरकार के पास होती है, न कि केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के पास।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक उपबंधों, शक्तियों और उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, किंतु महान्यायवादी के पद के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने की अर्हता रखता हो, बल्कि उसके पास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पांच वर्ष का अनुभव या उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में दस वर्ष का अनुभव होना आवश्यक है।
2. भारत का महान्यायवादी न केवल भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार होता है, बल्कि उसे देश के किसी भी न्यायालय में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, साथ ही उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार भी प्राप्त है, किंतु वह संविधान के अनुच्छेद 88 के अंतर्गत संसदीय बैठकों में अपने मत (Voting) के अधिकार का प्रयोग कर सकता है यदि सरकार द्वारा ऐसा विशेष निर्देश दिया जाए।
3. संविधान के अनुच्छेद 148 के अंतर्गत नियुक्त नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, तथा सीएजी अपनी पदवधि की समाप्ति के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के कार्यालय (Employment) के पात्र नहीं होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.