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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की स्वतंत्रता, प्रशासनिक नियंत्रण और अधीनस्थ न्यायालयों से संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात की जाती है, तथा राज्यपाल द्वारा यह अधिकारिक रूप से तय किया जाता है कि कौन सा व्यक्ति जिला न्यायाधीश बनने के योग्य है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 235 के अंतर्गत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों के नीचे के न्यायिक अधिकारियों की posting, पदोन्नति, पोस्टिंग और छुट्टियों का अनुदान शामिल है, पूरी तरह से संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होता है, न कि कार्यपालिका या राज्यपाल के पास।
- 3. अनुच्छेद 236 के तहत 'जिला न्यायाधीश' (District Judge) की परिभाषा में नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघु वाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट तथा सेशन जज शामिल होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 233 के तहत जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से तो की जाती है, किंतु राज्यपाल अपनी मर्जी से किसी को भी इस पद पर नियुक्त नहीं कर सकता; इसके लिए उच्च न्यायालय की अनुशंसा या परामर्श अनिवार्य होता है। इसके अतिरिक्त, न्यायिक सेवा के अन्य सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय और राज्य लोक सेवा आयोग से परामर्श करके की जाती है। कथन 2 बिल्कुल सही है; संविधान के अनुच्छेद 235 के अनुसार राज्यों के अधीनस्थ न्यायालयों (जिला न्यायालयों और उनके नीचे के न्यायालयों) पर प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह से उच्च न्यायालय में निहित होता है। कथन 3 सही है क्योंकि अनुच्छेद 236 में 'जिला न्यायाधीश' की परिभाषा व्यापक दी गई है जिसमें सेशन जज, मुख्य न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश आदि सम्मिलित हैं। भारतीय संविधान के इन अनुच्छेदों के बारे में अधिक जानने के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।
Related Questions
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति, प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार तथा मंत्रिपरिषद के कार्यसंचालन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66(1) के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण द्वारा होता है, जिसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं, किंतु राज्य विधानमंडलों के निर्वाचित और मनोनीत दोनों प्रकार के सदस्य इस निर्वाचकगण का हिस्सा नहीं होते हैं।
2. संविधान के अनुच्छेद 77 के प्रावधानों के तहत भारत सरकार के समस्त कार्यपालिका कृत्य राष्ट्रपति के नाम से हुए व्यक्त किए जाते हैं, किंतु प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रिपरिषद के बैठकों के एजेंडे और निर्णयों से राष्ट्रपति को अवगत कराने की प्रक्रिया का प्रत्यक्ष उल्लेख अनुच्छेद 78 में किया गया है।
3. राष्ट्रीय सुरक्षा या आपातकालीन परिस्थितियों में, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर मंत्रिपरिषद के किसी भी एक मंत्री को उसके पद से सीधे बर्खास्त कर सकता है, जिसके लिए प्रधानमंत्री की पूर्व लिखित अनुशंसा संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के सदनों की बैठकों में कोरम (गणपूर्ति), विधेयकों के पारित होने की प्रक्रिया और विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 189 के अनुसार राज्य विधानसभा या विधान परिषद की बैठक का गठन करने के लिए कोरम सदन के कुल सदस्यों की संख्या का दसवाँ हिस्सा या कम से कम 10 सदस्य (जो भी अधिक हो) होगा, और यदि सदन की बैठक के दौरान कोरम नहीं है, तो पीठासीन अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह सदन को स्थगित कर दे या बैठक को तब तक के लिए निलंबित रखे जब तक कोरम पूरा न हो जाए।
2. अनुच्छेद 197 के प्रावधानों के अनुसार यदि किसी साधारण विधेयक को राज्य की विधानसभा द्वारा पारित करके विधान परिषद में भेजा जाता है, और विधान परिषद उस विधेयक को अस्वीकार कर देती है या ऐसा संशोधन करती है जिसे विधानसभा स्वीकार नहीं करती, या विधान परिषद को विधेयक भेजे जाने की तारीख से तीन महीने की अवधि बीत जाने के बावजूद विधान परिषद द्वारा विधेयक पारित नहीं किया जाता है, तो विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पारित करके अपनी विधानसभा के साधारण बहुमत से सीधे राज्यपाल की अनुमति के लिए भेज सकती है।
3. अनुच्छेद 201 के अंतर्गत जब कोई विधेयक राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किए जाने के बाद राज्यपाल के विचार के लिए आरक्षित रखा जाता है, और राष्ट्रपति उसे अपने पास विचारार्थ रखता है, तो राष्ट्रपति राज्यपाल को यह निर्देश दे सकता है कि वह उस विधेयक को राज्य विधानमंडल के सदन या सदनों को पुनर्विचार के लिए लौटा दे, और ऐसे संदेश मिलने के बाद राज्य विधानमंडल को छह महीने की अवधि के भीतर उस विधेयक पर पुनर्विचार करना अनिवार्य होता है, और यदि विधानमंडल संशोधन के साथ या बिना संशोधन के उसे दोबारा पारित कर देता है, तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति देने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IVक के अंतर्गत उल्लिखित 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के प्रावधानों और उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था, जिसमें समिति ने नागरिकों द्वारा करों का भुगतान (Payment of Taxes) करने को भी एक मूल कर्तव्य के रूप में शामिल करने की संस्तुति की थी, जिसे इंदिरा गांधी सरकार ने स्वीकार नहीं किया था।
2. अनुच्छेद 51क के तहत प्रदत्त मूल कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं, और इनकी प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) है, जिसका अर्थ यह है कि यदि कोई नागरिक किसी मूल कर्तव्य का उल्लंघन करता है, तो उसे सीधे उच्चतम न्यायालय द्वारा दंडित किया जा सकता है।
3. न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (1999) ने मूल कर्तव्यों के शिक्षण और उनके प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित संस्तुतियाँ दी थीं, और इस समिति ने यह स्पष्ट किया था कि संविधान के कई मूल कर्तव्यों का सार भारतीय सांस्कृतिक और पारंपरिक मूल्यों जैसे पर्यावरण संरक्षण और भाईचारे में पहले से ही निहित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 से 4 के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को विधि द्वारा संघ में नए राज्यों के प्रवेश या उनकी स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, जिसका प्रयोग केवल विदेशी भू-भागों को भारत में शामिल करने के लिए किया जाता है, जबकि भारतीय संघ के भीतर के राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित मामले अनुच्छेद 3 के अंतर्गत आते हैं।
2. अनुच्छेद 3 के तहत किसी राज्य के नाम, सीमा या क्षेत्र में परिवर्तन करने वाले विधेयक को राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित किया जा सकता है, बशर्ते कि राष्ट्रपति उस विधेयक को संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजें और राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए संवैधानिक रूप से बाध्यकारी हो।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में यह निर्णय दिया गया था कि भारतीय क्षेत्र के किसी हिस्से को किसी अन्य देश को सौंपने (Cede) के लिए अनुच्छेद 3 के तहत साधारण बहुमत से संसद में कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत एक संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित करना अनिवार्य है।
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बलवंत राय मेहता समिति किससे संबंधित थी?
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