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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) और उनसे संबंधित न्यायिक सिद्धांतों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 13 के अंतर्गत 'विधि' (Law) की व्यापक परिभाषा में संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए अधिनियमों के अलावा अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम, विनियम और अधिसूचनाएं तो शामिल हैं, किंतु इसमें रूढ़ि या प्रथा (Custom or Usage) को शामिल नहीं किया गया है, भले ही उनका बल विधि जैसा क्यों न हो।
- 2. 'पृथक्करण का सिद्धांत' (Doctrine of Severability) यह सुनिश्चित करता है कि यदि मूल अधिकारों से असंगत कोई कानून (या उसका कोई भाग) इस प्रकार का है कि असंगत भाग को संगत भाग से अलग नहीं किया जा सकता, तो पूरा का पूरा अधिनियम ही शून्य हो जाएगा, न कि केवल असंगत भाग।
- 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया गया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु वह इस शक्ति का प्रयोग करके मूल अधिकारों के आधारभूत ढांचे (Basic Structure) को समाप्त या क्षीण नहीं कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 13(3)(a) के अनुसार 'विधि' शब्द के अंतर्गत केवल विधायी अधिनियम, अध्यादेश और आदेश ही नहीं, बल्कि भारत के राज्यक्षेत्र में विधि का बल रखने वाली रूढ़ियाँ या प्रथाएँ (Customs or Usages) भी पूर्ण रूप से सम्मिलित हैं। यदि कोई रूढ़ि या प्रथा किसी मूल अधिकार का उल्लंघन करती है, तो वह भी असंवैधानिक घोषित की जा सकती है। कथन 2 सत्य है; 'पृथक्करण का सिद्धांत' (Doctrine of Severability) के तहत यदि किसी कानून का कोई हिस्सा मूल अधिकारों से असंगत है और उसे वैध हिस्से से अलग किया जा सकता है, तो केवल असंगत हिस्से को ही शून्य किया जाता है पूरे कानून को नहीं, बशर्ते दोनों भाग एक-दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र हों। कथन 3 सत्य है; केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद को संविधान संशोधन की व्यापक शक्ति है, लेकिन संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure) बदला नहीं जा सकता। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जाएं।
Related Questions
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की प्रस्तावना पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत और 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किए गए 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) पर आधारित है, और इसे संविधान के लागू होने के पश्चात केवल एक बार (42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा) संशोधित किया गया है जिसके तहत इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए।
2. 'बेरुबारी यूनियन वाद (1960)' में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया था कि प्रस्तावना भारतीय संविधान का एक अभिन्न अंग (Integral Part) है, तथा संसद अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन करते हुए इसके किसी भी मूल भाग को हटा सकती है।
3. 'केशवानंद भारती वाद (1973)' और 'एल.आई.सी. ऑफ इंडिया वाद (1995)' में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णय को पलटते हुए यह व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान का एक आंतरिक और अभिन्न अंग है, और यद्यपि यह देश की विधायिका को कोई नई शक्ति प्रदान नहीं करती और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तथापि यह संविधान के 'मूल ढांचा' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग IV में अंतर्विष्ट राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके कार्यान्वयन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39A के अंतर्गत 'समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता' का प्रावधान मूल संविधान में नहीं था, बल्कि इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, और यह निर्देशक तत्व प्रकृति से गैर-न्यायोचित होने के बावजूद संसद को इसके क्रियान्वयन के लिए गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने हेतु 'विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987' जैसे कानून बनाने की संवैधानिक शक्ति प्रदान करता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 40 के तहत राज्य ग्राम पंचायतों के संगठन के लिए कदम उठाएगा और उन्हें ऐसी शक्तियाँ प्रदान करेगा जो उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों, तथा 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा इस नीति निर्देशक सिद्धांत को एक संवैधानिक और अनिवार्य संस्थागत स्वरूप प्रदान किया गया।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'मिनर्वा मिल्स वाद (1980)' में यह निर्धारित किया गया कि भाग III (मौलिक अधिकार) और भाग IV (नीति निर्देशक तत्व) एक-दूसरे के विरोधी हैं, और यदि किसी सामाजिक-आर्थिक कल्याणकारी कानून को लागू करने के लिए नीति निर्देशक तत्वों को प्राथमिकता दी जाती है, तो मौलिक अधिकारों का पूर्णतः अतिक्रमण किया जा सकता है, क्योंकि DPSP का स्थान संविधान में मौलिक अधिकारों से सर्वोपरि है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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वर्तमान में भारतीय संविधान में कुल कितनी अनुसूचियाँ (Schedules) हैं?
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प्रधानमंत्री की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान किस अनुच्छेद में है?
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मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) संविधान के किस भाग में वर्णित हैं?
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