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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनसे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों तथा न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 48A के अनुसार राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा, जिसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, जबकि इसी संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 43A जोड़कर उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया।
- 2. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे 'केशवानंद भारती वाद' और 'मिनर्वा मिल्स वाद') में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि नीति निर्देशक तत्व और मौलिक अधिकार एक-दूसरे के पूरक हैं, और यदि संसद अनुच्छेद 39(b) और 39(c) में उल्लिखित सामाजिक-आर्थिक न्याय के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कोई कानून बनाती है जो अनुच्छेद 14 या 19 का उल्लंघन करता है, तो ऐसे कानून को अनुच्छेद 31C के तहत मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता दी जा सकती है।
- 3. यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि निर्माण में इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है, तथापि संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) बनाया गया है, जिसका अर्थ है कि नागरिक इनके प्रवर्तन के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय की शरण ले सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में कुछ नए नीति निर्देशक तत्व जोड़े गए, जिनमें अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता), अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी), और अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों की रक्षा) प्रमुख हैं। कथन 2 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स वाद (1980) और अन्य मामलों में स्पष्ट किया कि भाग III (मूल अधिकार) और भाग IV (DPSP) एक-दूसरे के पूरक हैं। अनुच्छेद 31C के अनुसार, यदि कोई कानून अनुच्छेद 39(b) या 39(c) को लागू करने के लिए बनाया जाता है, तो उसे अनुच्छेद 14 और 19 के उल्लंघन के आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जा सकता। कथन 3 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 37 में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया गया है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत अवश्य हैं, किंतु इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Non-justiciable) **नहीं** बनाया गया है, यानी इनके उल्लंघन पर अदालतों में वाद दायर नहीं किया जा सकता। भारतीय संविधान के विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विजिट करें।
Related Questions
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भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित राजभाषाओं, राजनीतिक दलों की मान्यता तथा संविधान की विभिन्न सूचियों और भागों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें बाद में विभिन्न संशोधनों के माध्यम से जोड़ा गया; जैसे कि 21वें संविधान संशोधन द्वारा सिंधी को, 71वें संशोधन द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को, तथा 92वें संविधान संशोधन द्वारा बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को शामिल किया गया, जिससे वर्तमान में इस अनुसूची में कुल 22 राजभाषाएँ हैं।
2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 29A के तहत निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु किसी राजनीतिक दल को 'राष्ट्रीय दल' (National Party) या 'राज्यीय दल' (State Party) के रूप में मान्यता देने की शर्तें संविधान के अनुच्छेद 324 में प्रत्यक्ष रूप से उल्लिखित हैं।
3. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 348 में यह प्रावधान किया गया है कि संसद द्वारा जब तक कोई अन्य विधि नहीं बनाई जाती, तब तक उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय की सभी कार्यवाहियाँ तथा संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित प्रत्येक अधिनियम का प्राधिकृत पाठ केवल और केवल अंग्रेजी भाषा में ही होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग, राजभाषा और राजनीतिक दलों से संबंधित विधिक उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 344 के प्रावधानों के अनुपालन में राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 1955 में बाल गंगाधर खेर (बी.जी. खेर) की अध्यक्षता में प्रथम राजभाषा आयोग का गठन किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में यह संस्तुति दी थी कि उच्च न्यायालयों (High Courts) की कार्यवाहियों में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी या संबंधित राज्य की क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग वैकल्पिक रूप से किया जाना चाहिए।
2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) में राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु निर्वाचन आयोग को किसी पंजीकृत राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द (De-register) करने की कोई विधिक या संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है, सिवाय इसके कि दल ने धोखाधड़ी करके पंजीकरण प्राप्त किया हो या उसके संविधान में संशोधन कर लिया हो।
3. संविधान की नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, और इसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि इसमें शामिल किए जाने वाले विधियों को न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः सुरक्षित कर दिया जाएगा, किंतु केशवानंद भारती वाद (1973) के पश्चात उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए ऐसे कानून भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएंगे जो संविधान के मूलभूत ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों (अनुच्छेद 5-11) और संसद की विधाई शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 11 के अंतर्गत संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संपूर्ण शक्ति प्रदान की गई है, और इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1957 (Citizenship Act, 1957) को अधिनियमित किया था।
2. संविधान के प्रारंभ में (26 जनवरी 1950 को) अनुच्छेद 6 के प्रावधानों के तहत पाकिस्तान से भारत प्र्रव्रजन करने वाले व्यक्तियों के लिए नागरिकता के अर्जन की व्यवस्था की गई थी, जिसके अनुसार यदि वह व्यक्ति या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी में से कोई भी भारत शासन अधिनियम, 1935 में परिभाषित भारत में पैदा हुआ था, तो वह भारत का नागरिक बन सकता था, बशर्ते उसने 19 जुलाई 1948 से पहले प्र्रव्रजन किया हो और वह अपने प्र्रव्रजन की तिथि से सामान्यतः भारत में निवासी रहा हो।
3. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम या अन्य क्षेत्रों के अधिग्रहण के संदर्भ में यह प्रावधान है कि यदि भारत सरकार किसी विदेशी भू-भाग का अर्जन करती है, तो उस भू-भाग के निवासी स्वतः (ipso facto) भारत के नागरिक नहीं बन जाते हैं, बल्कि इसके लिए संसद द्वारा नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत विशेष नियम बनाए जाने अनिवार्य होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) को 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) का दर्जा प्राप्त है तथा इसके पास अपनी अवमानना (Contempt of Court) के लिए दंड देने की शक्ति है?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अधिकारिता, शक्तियों और न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 131 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय के आरंभिक (Original) क्षेत्राधिकार के दायरे में भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच का विवाद या दो या अधिक राज्यों के बीच का विवाद आता है, किंतु इसमें किसी संधि, समझौते या प्रसंविदा (Covenant) से उत्पन्न होने वाले विवाद भी शामिल होते हैं, भले ही वह संविधान के प्रारंभ से पूर्व का हो।
2. संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत उच्चतम न्यायालय को अपनी स्वयं की दी गई किसी भी निर्णय या आदेश की पुनराव समीक्षा (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, और संसद इस शक्ति को विधि बनाकर पूर्ण रूप से समाप्त कर सकती है।
3. संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर परामर्श मांगने की शक्ति है जो सार्वजनिक महत्व का हो, और उच्चतम न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि वह ऐसे प्रत्येक मामले में अपनी राय राष्ट्रपति को दे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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