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Indian Polity
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा शहरी स्थानीय शासन के संदर्भ में जोड़ी गई बारहवीं अनुसूची तथा नगरपालिकाओं के गठन एवं कार्यों के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. इस अधिनियम के तहत प्रत्येक राज्य में तीन प्रकार की नगरपालिकाओं के गठन का प्रावधान किया गया है—ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में संक्रमणशील क्षेत्रों के लिए नगर पंचायत, छोटे नगरीय क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषद और बड़े नगरीय क्षेत्र के लिए नगर निगम।
  2. 2. नगरपालिकाओं के सभी स्थानों के लिए निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से नगर क्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे मतदाताओं द्वारा किया जाता है, तथा इस अधिनियम में यह भी अनिवार्य किया गया है कि नगर पालिका के वार्ड समितियों (Ward Committees) का गठन केवल दस लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर निगमों के लिए ही किया जाएगा।
  3. 3. बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं की विधायी शक्तियों और उत्तरदायित्वों से संबंधित कुल 18 विषयों का उल्लेख किया गया है, जिनमें नगर योजना, भूमि उपयोग का विनियमन, आर्थिक और सामाजिक विकास योजनाएं, तथा अग्निशामक सेवाएं जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में भाग IX-क जोड़ा गया तथा अनुच्छेद 243Q के तहत प्रत्येक राज्य में तीन प्रकार की नगरपालिकाओं—नगर पंचायत (संक्रमणशील क्षेत्र), नगरपालिका परिषद (छोटा नगरीय क्षेत्र), और नगर निगम (बड़ा नगरीय क्षेत्र)—के गठन का प्रावधान किया गया है। कथन 2 गलत है: नगरपालिकाओं के सभी स्थानों के लिए निर्वाचन प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों (वार्डों) से प्रत्यक्ष रूप से होता है, किंतु वार्ड समितियों (Ward Committees) के गठन से संबंधित प्रावधान के अनुसार, तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरपालिका क्षेत्र के लिए वार्ड समितियों का गठन किया जाता है, न कि केवल दस लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर निगमों के लिए। कथन 3 सही है: 74वें संशोधन द्वारा जोड़ी गई बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं की शक्तियों, प्राधिकार और उत्तरदायित्वों से संबंधित कुल 18 कार्यात्मक विषयों का उल्लेख किया गया है, जिनमें नगर योजना, भूमि उपयोग, आर्थिक व सामाजिक विकास, और अग्निशामक सेवाएं आदि शामिल हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर अध्ययन करें।
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राज्य की कार्यपालिका के संबंध में राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण तथा मुख्यमंत्री के संवैधानिक दायित्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार राज्यपाल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की शक्ति राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी अधिनियम के समान ही होती है, किंतु यह अध्यादेश राज्य विधानमंडल के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह की अवधि के भीतर स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है, बशर्ते इस अवधि से पहले विधानमंडल द्वारा इसे अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित न कर दिया जाए। 2. अनुच्छेद 167 के अंतर्गत मुख्यमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन और विधान संबंधी प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे, और यदि राज्यपाल ऐसी कोई सूचना माँगता है, तो उसे उपलब्ध कराए, तथा राज्यपाल के इस अधिकार में मंत्रिपरिषद के निर्णयों के विरुद्ध जाकर सीधे किसी भी प्रशासनिक विभाग से स्पष्टीकरण माँगने की विवेकीय शक्ति भी शामिल है। 3. राज्य विधानसभा द्वारा पारित कोई विधेयक जब राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल उस पर अपनी अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है (धन विधेयक को छोड़कर), अथवा उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख सकता है, किंतु यदि कोई विधेयक राज्य के उच्च न्यायालय की शक्तियों को इस प्रकार अल्पीकरण करता है कि जिससे उसका संवैधानिक अस्तित्व खतरे में पड़ जाए, तो राज्यपाल के लिए ऐसे विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना संवैधानिक रूप से अनिवार्य होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) और केंद्र-राज्यीय वित्तीय एवं प्रशासनिक संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को 'अंतर-राज्यीय परिषद्' की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि ऐसी परिषद् की स्थापना से लोकहित होगा, तो वह संघ और राज्यों के बीच अथवा राज्यों के आपसी विवादों की जाँच करने, उन पर सलाह देने तथा सामान्य हित के विषयों की बेहतर जाँच और विचार-विमर्श करने के लिए इसका गठन कर सकता है। 2. अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना सरकारी आयोग (Sarkaria Commission) की वर्ष 1988 की मुख्य संस्तुतियों के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में की गई थी, जिसके तहत वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा इसे एक स्थायी निकाय (Permanent Body) के रूप में स्थापित किया गया, तथा इसके अध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री होते हैं। 3. अंतर-राज्यीय परिषद् की संरचना के अंतर्गत सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल या प्रशासक, तथा प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत केंद्रीय मंत्रिपरिषद के कैबिनेट स्तर के छह मंत्री इसके स्थायी सदस्य होते हैं, और इस परिषद् द्वारा लिया गया प्रत्येक निर्णय या संस्तुति केंद्र और राज्य सरकारों के लिए कानूनी रूप से पूर्णतः बाध्यकारी (Binding) होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक उपबंधों, अधिकारों तथा उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत नियुक्त भारत का महान्यायवादी देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है, और उसे भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो होता है, किंतु उसे संसद में मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। 2. संविधान के अनुच्छेद 148 के अनुसार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा की जाती है, और उसे उसके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। 3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) अपनी पदमुक्ति के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के अन्य कार्यालय या नियोजन (Further Office of Profit) के लिए पात्र होता है, क्योंकि संविधान में सीएजी के पुनर्नियुक्ति या पुनः निर्वाचन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? 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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की स्वतंत्रता, प्रशासनिक नियंत्रण और अधीनस्थ न्यायालयों से संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात की जाती है, तथा राज्यपाल द्वारा यह अधिकारिक रूप से तय किया जाता है कि कौन सा व्यक्ति जिला न्यायाधीश बनने के योग्य है। 2. संविधान के अनुच्छेद 235 के अंतर्गत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों के नीचे के न्यायिक अधिकारियों की posting, पदोन्नति, पोस्टिंग और छुट्टियों का अनुदान शामिल है, पूरी तरह से संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होता है, न कि कार्यपालिका या राज्यपाल के पास। 3. अनुच्छेद 236 के तहत 'जिला न्यायाधीश' (District Judge) की परिभाषा में नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघु वाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट तथा सेशन जज शामिल होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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