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Indian Polity
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भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की शक्तियों, संरचना और देश में चुनावी सुधारों से संबंधित विभिन्न समितियों (जैसे दिनेश गोस्वामी समिति और इंद्रजीत गुप्ता समिति) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग की स्थापना एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में मूल रूप से वर्ष 1950 में ही की गई थी, जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल थे।
- 2. इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) ने अपनी रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के 'राज्य द्वारा वित्तीय पोषण' (State Funding of Elections) के सिद्धांत का समर्थन किया था, बशर्ते यह वित्तपोषण केवल मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को वस्तु के रूप में (In kind) दिया जाए न कि नगद रूप में।
- 3. वर्ष 2002 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में किए गए संशोधन के अनुसार, चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक उम्मीदवार के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया कि वह अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल शपथ-पत्र (Affidavit) में अपने आपराधिक मामलों, चल-अचल संपत्तियों और शैक्षणिक योग्यताओं का पूर्ण विवरण दे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि मूल संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) से मिलकर बनने वाला एक एकल-सदस्यीय निकाय था। पहली बार 16 अक्टूबर 1989 को इसे बहु-सदस्यीय बनाया गया था। कथन 2 सत्य है; इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) ने चुनावों के राज्य वित्तपोषण का समर्थन किया था और यह सिफारिश की थी कि यह वित्तीय सहायता केवल मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को पेट्रोल, पेपर, लाउडस्पीकर जैसी वस्तुओं के रूप में (In kind) दी जानी चाहिए, न कि नगद। कथन 3 सत्य है; सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में वर्ष 2002 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन करके उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और योग्यता की घोषणा का शपथ-पत्र अनिवार्य किया गया था। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर अध्ययन करें।
Related Questions
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भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) और उनके न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 13 के खंड (2) के अंतर्गत राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बना सकता जो भाग III द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनता हो या न्यून करता हो, और इस प्रकार का कोई भी कानून उल्लंघन की मात्रा तक शून्य (Void) होगा, तथा सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32 के तहत और उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत यह न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति प्रदान की गई है।
2. 'शक्तिकरण का सिद्धांत' (Doctrine of Severability) यह सुनिश्चित करता है कि यदि किसी अधिनियम का कोई भाग या उपबंध मूल अधिकारों के असंगत है, तो केवल वही असंगत भाग शून्य घोषित किया जाएगा, न कि पूरा अधिनियम, बशर्ते वह असंगत भाग शेष अधिनियम से इस प्रकार जुड़ा न हो कि उसे अलग करने पर पूरा कानून ही निरर्थक या निष्प्रभावी हो जाए।
3. 'अधिग्रहण का सिद्धांत' (Doctrine of Eclipse) उन पूर्व-संवैधानिक (Pre-Constitutional) विधियों पर पूर्ण रूप से लागू होता है जो संविधान लागू होने से पहले बनाई गई थीं और मूल अधिकारों से असंगत थीं, और ऐसी विधियाँ पूरी तरह से समाप्त (Dead) हो जाती हैं तथा भविष्य में किसी भी संवैधानिक संशोधन के माध्यम से उन्हें कभी भी पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) में निहित समाजवादी सिद्धांतों के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए कानूनों को इस आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जा सकता कि वे अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, बशर्ते कि ऐसा कानून नीति निर्देशक तत्वों को प्रभावी बनाने के लिए बनाया गया हो (यह संरक्षण मूल रूप से 25वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था)।
2. यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मौलिक हैं और देश की विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, तथापि इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं ठहराया गया है, जिसका अर्थ है कि इनके हनन पर सीधे उच्चतम न्यायालय में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की जा सकती है।
3. स्वर्ण सिंह समिति (1976) की सिफारिश पर ही भारतीय संविधान में भाग IV-A के अंतर्गत मूल कर्तव्यों को जोड़ा गया था, और इस समिति ने ही यह संस्तुति की थी कि नीति निर्देशक तत्वों को मूल अधिकारों पर सर्वोच्चता प्रदान की जानी चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधायी प्रक्रिया, लोकसभा और राज्यसभा के गठन तथा उनके विशेष अधिकारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार लोकसभा में राज्यों के प्रतिनिधि प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं, और इसके लिए मतदान करने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई थी जिसे 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा घटाकर 18 वर्ष किया गया।
2. अखिल भारतीय सेवाओं (All India Services) के सृजन से संबंधित अनुच्छेद 312 का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही प्रारंभ किया जा सकता है, और इसे उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित किया जाना आवश्यक होता है, जिसमें लोकसभा की कोई विधायी पहल या शक्ति शामिल नहीं होती है।
3. अनुच्छेद 108 के अंतर्गत बुलाई जाने वाली संसद की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो इस संयुक्त बैठक की अध्यक्षता राज्यसभा के सभापति द्वारा की जाती है।
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राज्यों के उच्च न्यायालयों की अधिकारिता, उनके न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण तथा अधीनस्थ न्यायालयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत किसी उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) का दायरा उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट अधिकारिता से अधिक विस्तृत है, क्योंकि उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के अलावा 'किसी अन्य प्रयोजन' के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा उस राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है, और राज्यपाल द्वारा जिला न्यायाधीश से भिन्न व्यक्तियों की न्यायिक सेवा के पदों पर नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात ही की जाती है।
3. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 3 के अंतर्गत 'प्रशासन की स्थापना, उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों का गठन और संगठन' पूर्ण रूप से राज्य सरकारों के विधाई क्षेत्राधिकार के अधीन आता है, और इसमें संसद को किसी भी प्रकार की कानून बनाने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate Courts) की शक्तियों, अधिकारक्षेत्र और उनकी संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत किसी उच्च न्यायालय की रिट (Writ) अधिकारिता, उच्चतम न्यायालय की अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्राप्त रिट अधिकारिता की तुलना में अधिक विस्तृत है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य विधिक अधिकार (Legal Right) के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के प्रावधानों के अनुसार, किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है, और जिला न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायिक सेवा के व्यक्तियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात नियमों के अनुसार की जाती है।
3. अनुच्छेद 235 के अंतर्गत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण (जिसमें जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों की पोस्टिंग, प्रमोशन और छुट्टी से संबंधित नियंत्रण शामिल है) पूरी तरह से संबंधित राज्य सरकार के गृह विभाग में निहित होता है, और इसमें उच्च न्यायालय की कोई भूमिका नहीं होती है।
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