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Indian Polity
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) के कार्यों, उनके क्षेत्राधिकार के विस्तार तथा लोक सेवा आयोगों की स्वायत्तता से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 320 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग से अखिल भारतीय सेवाओं, केंद्रीय सेवाओं और राज्य सेवाओं की नियुक्तियों के लिए अपनाई जाने वाली पद्धतियों पर परामर्श करना अनिवार्य है, और यदि सरकार आयोग के परामर्श के विरुद्ध कोई निर्णय लेती है, तो उस कारण को संसद या राज्य विधानमंडल के समक्ष रखना वैधानिक रूप से आवश्यक होता है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 321 के अंतर्गत संसद या राज्य का विधानमंडल, क्रमशः संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग के कार्यों के दायरे का विस्तार करके उन्हें किसी स्थानीय प्राधिकारी, निगम या अन्य लोक निकाय (Public Institution) के अधीन आने वाली सेवाओं की नियुक्तियों से संबंधित मामलों को भी अपने अधिकार क्षेत्र में शामिल करने के लिए विधि बना सकता है।
- 3. संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों या कर्मचारियों को देय सभी वेतन, भत्ते और पेंशन, जिनमें प्रशासनिक व्यय भी शामिल हैं, संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित (Charged) होते हैं, ताकि आयोग कार्यपालिका के वित्तीय दबाव से पूरी तरह मुक्त रहकर स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 320 के अंतर्गत लोक सेवा आयोगों से विभिन्न नियुक्तियों की पद्धतियों और अनुशासनात्मक मामलों पर परामर्श किया जाना अपेक्षित है। यदि सरकार आयोग की सलाह के विरुद्ध कार्य करती है, तो उसे असहमति के कारणों को संसद या राज्य विधानमंडल के पटल पर रखना होता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 321 संसद और राज्य विधानमंडलों को यह शक्ति देता है कि वे कानून बनाकर UPSC या SPSC के कार्यों के दायरे का विस्तार कर सकते हैं, जिससे वे स्थानीय निकायों या निगमों के मामलों को भी संभाल सकें। कथन 3 गलत है: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के सभी व्यय 'भारत की संचित निधि' (Consolidated Fund of India) पर भारित होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के व्यय संबंधित 'राज्य की संचित निधि' पर भारित होते हैं; दोनों के व्यय एक ही निधि पर भारित नहीं होते। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल का अध्ययन करें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधाई, प्रशासनिक संबंधों तथा अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को लोक हित में अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और इस परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना, ऐसे विषयों पर विचार-विमर्श करना जिनमें राज्यों के साझा हित हों, तथा बेहतर समन्वय के लिए संस्तुतियाँ देना है, किंतु इस परिषद् द्वारा दिए गए निर्णय और संस्तुतियाँ संबंधित राज्य सरकारों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी (Legally Binding) होती हैं।
2. सरकारिया आयोग (1983-88) की संस्तुतियों के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा स्थायी अंतर-राज्यीय परिषद् का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, और इसके सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, संघ राज्य क्षेत्रों (जहाँ विधानसभाएँ हैं) के मुख्यमंत्री, तथा प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत केंद्रीय मंत्रिपरिषद के कैबिनेट स्तर के छह मंत्री शामिल होते हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 258 के अंतर्गत राष्ट्रपति, किसी राज्य की सरकार की सहमति से उस सरकार को या उसके अधिकारियों को ऐसे कृत्यों को सौंप सकता है जो संघ की कार्यकारी शक्ति के अंतर्गत आते हैं, और इसके विपरीत अनुच्छेद 258A के अनुसार किसी राज्य का राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से उस केंद्र सरकार को अपने राज्य की कार्यकारी शक्ति के अधीन आने वाले कार्य सौंप सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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राज्य की कार्यपालिका (राज्यपाल और मुख्यमंत्री) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को अपनी कृत्यों का निर्वहन करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा, तथा यह उपबंधित किया गया है कि राज्यपाल द्वारा अपने विवेकिय कार्यों (Discretionary Powers) के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य को करने में दी गई सलाह की न्यायसंगतता (Judicial Review) की जाँच किसी भी न्यायालय में की जा सकती है।
2. अनुच्छेद 164 के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाएगी, तथा मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करेंगे, जिसमें यह संवैधानिक नियम भी निहित है कि यदि विधानसभा में मुख्यमंत्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए तो राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर सकता है।
3. अनुच्छेद 200 के तहत जब राज्य के विधानमंडल द्वारा कोई विधेयक पारित कर राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल के पास यह विकल्प होता है कि वह विधेयक पर अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, या विधेयक को (धन विधेयक को छोड़कर) राज्य विधानमंडल के पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है, किंतु यदि विधानमंडल संशोधन सहित या रहित विधेयक को पुनः पारित कर देता है, तो राज्यपाल उस पर अपनी अनुमति देने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 और शहरी स्थानीय शासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया तथा अनुच्छेद 243-Q के तहत प्रत्येक राज्य में तीन प्रकार की नगरपालिकाओं के गठन का प्रावधान किया गया—ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित होने वाले क्षेत्रों के लिए नगर पंचायत, छोटे शहरी क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषद, और बड़े शहरी क्षेत्र के लिए नगर निगम।
2. संविधान की 12वीं अनुसूची में नगरपालिकाओं की विधाई शक्तियों और उत्तरदायित्वों से संबंधित कुल 18 विषय सूचियों का उल्लेख किया गया है, और इन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति राज्य विधानमंडल में निहित है, न कि अनिवार्य रूप से नगरपालिकाओं को सौंपे जाने की संवैधानिक बाध्यता है।
3. 74वें संविधान संशोधन के तहत प्रत्येक नगरपालिका में वार्ड समितियों (Wards Committees) का गठन अनिवार्य किया गया है, किंतु यह प्रावधान केवल उन नगरपालिकाओं पर लागू होता है जिनकी कुल जनसंख्या 3 लाख या उससे अधिक है।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना, अधिकारिता एवं नियंत्रण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति उस राज्य के राज्यपाल द्वारा उस राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात की जाती है, और जिला न्यायाधीश की अर्हता के लिए यह अनिवार्य है कि वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता या प्लीडर रहा हो तथा संघ या राज्य की न्यायिक सेवा में पहले से कार्यरत न हो।
2. संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों (जिला न्यायालयों और उनके नीचे के न्यायालयों) पर नियंत्रण की शक्ति, जिसमें उनकी पोस्टिंग, प्रमोशन और छुट्टी का अनुदान शामिल है, पूर्णतः संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होती है, न कि राज्य के राज्यपाल या कार्यपालिका के पास।
3. अनुच्छेद 227 के अंतर्गत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के भीतर आने वाले सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (Tribunals) पर अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति प्राप्त है, और इस अधीक्षण शक्ति का विस्तार केवल प्रशासनिक मामलों तक ही सीमित है, यह किसी भी स्थिति में न्यायिक निर्णयों की समीक्षा या अपील तक विस्तारित नहीं हो सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 315 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्य लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया है, तथा दो या अधिक राज्यों के लिए एक 'संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग' (JSPSC) का गठन संबंधित राज्यों के अनुरोध पर संसद द्वारा एक अधिनियम के माध्यम से किया जाता है, जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 317 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को केवल राष्ट्रपति द्वारा ही उनके पद से हटाया जा सकता है, भले ही राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।
3. संघ लोक सेवा आयोग के व्यय, जिनमें उसके सदस्यों या कर्मचारियों को देय या उनके संबंध में कोई वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित (Charged) होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के ऐसे सभी व्यय भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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