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Indian Polity
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भारतीय संविधान के विभिन्न भागों, अनुसूचियों, राजभाषा तथा राजनीतिक दलों के विधिक और संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 348 में यह उपबंध किया गया है कि उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय की सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में ही होंगी, किंतु किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, राज्य के उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिंदी भाषा या उस राज्य में आधिकारिक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी अन्य भाषा के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकता है।
- 2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के प्रावधानों के तहत भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु किसी पंजीकृत दल को 'राष्ट्रीय दल' (National Party) के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए यह अनिवार्य है कि वह कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे और साथ ही कम से कम चार राज्यों से लोकसभा में चार सांसद निर्वाचित करे।
- 3. संविधान की नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, और 'केशवानंद भारती वाद' (1973) के निर्णय के पश्चात यह स्थापित किया गया है कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में सम्मिलित किए जाने वाले किसी भी अधिनियम या विनिमय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) इस आधार पर की जा सकती है कि वे संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन करते हैं या नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 348(2) के अनुसार, किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उच्च न्यायालय की कार्यवाही (निर्णय, डिक्री या आदेश को छोड़कर) में हिंदी या राज्य की राजभाषा के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकता है।
कथन 2 गलत है: 'राष्ट्रीय दल' के रूप में मान्यता प्राप्त करने की शर्तों में यह आवश्यक है कि दल को कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का 6% मत मिले और इसके अतिरिक्त किसी एक या अधिक राज्यों से लोकसभा में कम से कम 4 सीटें (सांसद) जीती हों, न कि चार राज्यों से चार सांसद।
कथन 3 सही है: 'आई.आर. कोएल्हो वाद' (2007) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि वे मौलिक अधिकारों या संविधान के मूल ढांचे का हनन करते हैं। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था।
कथन 2 गलत है: 'राष्ट्रीय दल' के रूप में मान्यता प्राप्त करने की शर्तों में यह आवश्यक है कि दल को कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का 6% मत मिले और इसके अतिरिक्त किसी एक या अधिक राज्यों से लोकसभा में कम से कम 4 सीटें (सांसद) जीती हों, न कि चार राज्यों से चार सांसद।
कथन 3 सही है: 'आई.आर. कोएल्हो वाद' (2007) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि वे मौलिक अधिकारों या संविधान के मूल ढांचे का हनन करते हैं। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था।
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भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) को 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) का दर्जा प्राप्त है तथा इसके पास अपनी अवमानना (Contempt of Court) के लिए दंड देने की शक्ति है?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसकी विधिक प्रकृति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत और 22 जनवरी 1947 को स्वीकृत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) का ही परिष्कृत रूप भारतीय संविधान की प्रस्तावना है।
2. 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जा सकता है।
3. प्रस्तावना में उल्लिखित 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक' न्याय के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरित होकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व' के आदर्श फ्रांस की क्रांति (1789) से लिए गए हैं।
4. संविधान की प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है और न ही यह न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) है, अर्थात इसके प्रावधानों को किसी भी न्यायालय में स्वतः प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 110 के अंतर्गत किसी विधेयक को 'धन विधेयक' (Money Bill) के रूप में प्रमाणित करने की अनन्य शक्ति लोकसभा अध्यक्ष के पास होती है, और लोकसभा अध्यक्ष का यह प्रमाणन अंतिम होता है तथा इसे किसी भी न्यायालय या सदन में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
2. वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I), जिसका उल्लेख अनुच्छेद 117(1) में किया गया है, को लोकसभा में केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश से ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, और इस प्रकार के वित्तीय विधेयक को पारित करने के संबंध में लोकसभा और राज्यसभा की शक्तियां साधारण विधेयक की तरह पूर्णतः समान होती हैं।
3. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत आने वाले वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II), जिनमें ऐसे उपबंध होते हैं जिनसे भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़े, को संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना भी पुनः स्थापित किया जा सकता है, किंतु राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना ऐसा कोई भी विधेयक किसी भी सदन द्वारा पारित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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