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History of India
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भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के संदर्भ में 'ग़दर पार्टी' और उसके कार्यक्रमों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. ग़दर पार्टी की स्थापना वर्ष 1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर में लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना और कांशीराम जैसे क्रूर क्रांतिकारियों के प्रयासों से हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था।
  2. 2. इस पार्टी द्वारा 'ग़दर' नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन मुख्य रूप से उर्दू और गुरुमुखी लिपि में किया जाता था, जिसके प्रत्येक अंक के पहले पृष्ठ पर 'अंग्रेज़ी राज का कच्चा चिट्ठा' शीर्षक से ब्रिटिश नीतियों की आलोचना छपती थी।
  3. 3. प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ होने पर ग़दर पार्टी के नेताओं ने जर्मनी और बर्लिन में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों (जैसे वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय) के साथ मिलकर 'बर्लिन समिति' की सहायता से ब्रिटिश सेना में कार्यरत भारतीय सैनिकों को बगावत के लिए प्रेरित करने की एक व्यापक योजना बनाई थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

दिए गए तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। वर्ष 1913 में सोहन सिंह भकना के अध्यक्ष और लाला हरदयाल के नेतृत्व में सैन फ्रांसिस्को में 'पैसिफिक कोस्ट हिंदुस्तान एसोसिएशन' की स्थापना हुई थी, जिसे आगे चलकर 'ग़दर पार्टी' के रूप में प्रसिद्धि मिली। इस पार्टी ने 'ग़दर' अखबार के माध्यम से प्रवासियों में राष्ट्रवाद की अलख जगाई। प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने पर ग़दर पार्टी के सदस्यों ने भारत लौटकर छावनियों में विद्रोह फैलाने का असफल किंतु ऐतिहासिक प्रयास किया था। अधिक जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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वर्ष 1857 के विद्रोह की प्रकृति और उसके वैचारिक मूल्यांकन के संदर्भ में, विभिन्न इतिहासकारों द्वारा दिए गए प्रसिद्ध कथनों पर विचार कीजिए: 1. वी. डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' में इस महान विद्रोह को सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी है। 2. डॉ. आर. सी. मजूमदार का यह प्रसिद्ध मत था कि 'तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न तो प्रथम, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।'- 3. सर जॉन लॉरेन्स और सी. ई. आर. सी. सी. रीस के अनुसार यह विद्रोह मूल रूप से केवल 'सिपाही विद्रोह' (Sepoy Mutiny) था, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय मुक्ति न होकर सैनिकों का पेशेवर असंतोष था। 4. टी. आर. होम्स का यह कथन था कि यह विद्रोह 'सभ्यता और बर्बरता के बीच का संघर्ष' था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के दौरान स्थापित विभिन्न संगठनों, उनके संस्थापकों तथा उनके वैचारिक दृष्टिकोण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और जन्मगत जाति व्यवस्था का जोरदार खंडन किया, किंतु इसने पाश्चात्य शिक्षा और तर्कवाद को अपनाते हुए भी उपनिषदों के एकेश्वरवादी सिद्धांतों को अपने धार्मिक दर्शन का आधार बनाया। 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और वेदों को अपरिवर्तनीय तथा अपौरुषेय मानते हुए मूर्तिपूजा, अवतारवाद और कर्मकांडों का समर्थन किया। 3. आत्माराम पांडुरंग द्वारा 1867 में स्थापित 'प्रार्थना समाज' का मुख्य उद्देश्य महाराष्ट्र में भक्ति परंपरा के आधार पर सामाजिक सुधार करना था, जिसने अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और महिला शिक्षा के प्रसार पर विशेष बल दिया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? प्राचीन भारतीय इतिहास के अंतर्गत वर्धन राजवंश और दक्षिण भारत के राजवंशों (पल्लव, चालुक्य एवं चोल) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापि के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की थी, और इसी विजय के स्मरणस्वरूप उसने महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म 'रथ मंदिरों' (सप्त पगोडा) का निर्माण कार्य आरंभ करवाया था। 2. बादामी के चालुक्य राजवंश के महान शासक पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल शिलालेख की रचना उसके दरबारी कवि रविचन्द्र ने प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में की थी, जिसमें कालिदास और भारवि के उल्लेख के साथ-साथ पुलकेशिन द्वारा नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को पराजित करने का वर्णन मिलता है। 3. चोल साम्राज्य की स्थानीय स्वशासन प्रणाली का विस्तृत विवरण हमें पल्लव काल के उत्तरमेरूर अभिलेख (Uttiramerur Inscriptions) से प्राप्त होता है, जो राजराजा प्रथम और राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में ग्राम सभाओं (उर, महासभा और नागरम्) के सदस्यों की निर्वाचन पद्धति और योग्यता का स्पष्ट मापदंड प्रस्तुत करता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 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1857 के महान विद्रोह के उपरांत ब्रिटिश प्रशासनिक ढाँचे में हुए व्यापक परिवर्तनों और भारत सरकार अधिनियम 1858 (क्वीन विक्टोरिया की घोषणा) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारत सरकार अधिनियम 1858 के द्वारा भारत का शासन कंपनी के हाथों से सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया, जिसके तहत 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' और 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' को समाप्त कर उनके समस्त अधिकार 'भारत के राज्य सचिव' (Secretary of State for India) और उसकी सहायता के लिए गठित 15 सदस्यीय 'इंडिया काउंसिल' को सौंप दिए गए। 2. क्वीन विक्टोरिया की ऐतिहासिक घोषणा (जिसे इलाहाबाद दरबार में 1 नवंबर 1858 को लॉर्ड कैनिंग द्वारा पढ़ा गया था) में यह घोषणा की गई कि ब्रिटिश सरकार अब भारतीय रियासतें हड़पने की अपनी पुरानी विस्तारवादी नीतियों (जैसे गोद निषेध प्रथा या 'Doctrine of Lapse') को और अधिक सख्ती से लागू करेगी। 3. इस घोषणा में भारतीयों को यह स्पष्ट आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार उनकी प्राचीन धार्मिक आस्थाओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक परंपराओं का पूर्ण सम्मान करेगी तथा नस्ल, वर्ण या धर्म के भेदभाव के बिना बिना किसी बाधा के सभी योग्य नागरिकों को लोक सेवाओं (Public Services) में उच्च पद प्रदान किए जाएंगे। 4. विद्रोह की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए ब्रिटिश सेना का पूर्ण पुनर्गठन किया गया, जिसके अंतर्गत सेना में यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ाया गया तथा तोपखाने (Artillery) जैसे संवेदनशील सैन्य विभागों पर पूर्णतः यूरोपीय नियंत्रण रखा गया, जबकि 'भर्ती के संतुलन' (Balance of Power) सिद्धांत के तहत अवध, बिहार और मध्य भारत के सैनिकों की भर्ती कम करके गोरखा, सिख और पठानों को अधिक प्राथमिकता दी गई। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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