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History of India
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वर्धन राजवंश और दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) के राजनीतिक, प्रशासनिक और स्थापत्य विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय को निर्णायक रूप से पराजित कर 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की थी और इसी विजय के स्मरणोत्सव स्वरूप महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म (monolithic) रथ मंदिरों का निर्माण कार्य आरंभ कराया था।
  2. 2. चोल राजवंश के उत्तरमेरूर शिलालेख (परांतक प्रथम के शासनकाल के) से ग्राम प्रशासन की स्वायत्तता का विस्तृत विवरण मिलता है, जिसके अनुसार 'उर' सामान्य ग्राम सभा थी, 'सभा' अग्रहार या ब्राह्मण बहुल गाँवों की स्वायत्त सभा थी, और 'नगरम्' व्यापारियों की संस्था थी।
  3. 3. हर्षवर्धन के शासनकाल में आयोजित 'कन्नौज की महाधर्म परिषद' का मुख्य उद्देश्य केवल हीनयान बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करना था, और चीनी यात्री ह्वेनसांग ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन की चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के हाथों हुई पराजय का अपनी यात्रा वृत्तांत में पूर्णतः खंडन किया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: पल्लव वंश के शक्तिशाली शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) ने 642 ईस्वी के आसपास वातापी (बदामी) के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर उसकी हत्या कर दी थी और 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की थी। उसी के शासनकाल में महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) के प्रसिद्ध एकाश्मक रथ मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ था। कथन 2 सही है: चोल साम्राज्य की स्थानीय स्वशासन प्रणाली की जानकारी उत्तरमेरूर अभिलेखों से मिलती है, जो ग्राम प्रशासन, निर्वाचन प्रक्रिया और समितियों के गठन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। कथन 3 गलत है: कन्नौज की महाधर्म परिषद का मुख्य उद्देश्य महायान बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करना और ह्वेनसांग का सम्मान करना था, न कि हीनयान का। इसके अलावा, ह्वेनसांग ने नर्मदा के युद्ध में हर्षवर्धन की पुलकेशिन द्वितीय के हाथों पराजय का स्पष्ट उल्लेख किया है। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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