त्वरित लिंक्स
History of India
18 views
वर्धन राजवंश और दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) के राजनीतिक, प्रशासनिक और स्थापत्य विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय को निर्णायक रूप से पराजित कर 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की थी और इसी विजय के स्मरणोत्सव स्वरूप महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म (monolithic) रथ मंदिरों का निर्माण कार्य आरंभ कराया था।
- 2. चोल राजवंश के उत्तरमेरूर शिलालेख (परांतक प्रथम के शासनकाल के) से ग्राम प्रशासन की स्वायत्तता का विस्तृत विवरण मिलता है, जिसके अनुसार 'उर' सामान्य ग्राम सभा थी, 'सभा' अग्रहार या ब्राह्मण बहुल गाँवों की स्वायत्त सभा थी, और 'नगरम्' व्यापारियों की संस्था थी।
- 3. हर्षवर्धन के शासनकाल में आयोजित 'कन्नौज की महाधर्म परिषद' का मुख्य उद्देश्य केवल हीनयान बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करना था, और चीनी यात्री ह्वेनसांग ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन की चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के हाथों हुई पराजय का अपनी यात्रा वृत्तांत में पूर्णतः खंडन किया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: पल्लव वंश के शक्तिशाली शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) ने 642 ईस्वी के आसपास वातापी (बदामी) के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर उसकी हत्या कर दी थी और 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की थी। उसी के शासनकाल में महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) के प्रसिद्ध एकाश्मक रथ मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ था। कथन 2 सही है: चोल साम्राज्य की स्थानीय स्वशासन प्रणाली की जानकारी उत्तरमेरूर अभिलेखों से मिलती है, जो ग्राम प्रशासन, निर्वाचन प्रक्रिया और समितियों के गठन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। कथन 3 गलत है: कन्नौज की महाधर्म परिषद का मुख्य उद्देश्य महायान बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करना और ह्वेनसांग का सम्मान करना था, न कि हीनयान का। इसके अलावा, ह्वेनसांग ने नर्मदा के युद्ध में हर्षवर्धन की पुलकेशिन द्वितीय के हाथों पराजय का स्पष्ट उल्लेख किया है। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
→
सिंधु घाटी सभ्यता की परिपक्व अवस्था के दौरान विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त विशिष्ट अवशेषों, व्यापारिक वस्तुओं और उनकी भौगोलिक अवस्थिति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चान्हूदो एकमात्र ऐसा हड़प्पाकालीन स्थल था जहाँ किसी भी प्रकार के गढ़ (Citadel या Fortification) के अवशेष नहीं मिले हैं, और यह स्थल मुख्य रूप से मनके बनाने, सीप की कटाई और मुहर निर्माण जैसे शिल्प उद्योगों का एक प्रमुख केंद्र था।
2. बनावली (हरियाणा) से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों में पक्की मिट्टी (Terracotta) से बने हल का एक प्रतिरूप मिला है, तथा इस स्थल की नगर योजना सिंधु घाटी की अन्य बस्तियों के विपरीत 'ग्रिड पद्धति' पर आधारित न होकर अरीय (Radial) और अनियमित विन्यास को दर्शाती है।
3. सुरकोटडा एकमात्र ऐसा सैंधव स्थल है जहाँ से घोड़े की वास्तविक अस्थियों (Horse remains) के स्पष्ट पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जबकि परिपक्व हड़प्पा संस्कृति के सामान्य जनजीवन में घोड़े के व्यापक प्रयोग के साक्ष्य अन्य स्थलों से बहुतायत में मिलते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
→
वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन और उसके विरोध में उपजे स्वदेशी आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल विभाजन के निर्णय की आधिकारिक घोषणा 20 जुलाई 1905 को लॉर्ड कर्जन द्वारा की गई थी, जिसके विरोध में 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में आयोजित ऐतिहासिक बैठक में 'स्वदेशी आंदोलन' का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया गया।
2. 16 अक्टूबर 1905 को जिस दिन बंगाल विभाजन प्रभावी हुआ, उस दिन पूरे बंगाल में 'शोक दिवस' के रूप में मनाया गया, जहाँ लोगों ने उपवास रखा, एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर के आह्वान पर प्रसिद्ध देशभक्ति गीत 'आमार सोनार बांग्ला' गाया गया।
3. स्वदेशी आंदोलन के दौरान आर्थिक बहिष्कार और आत्मनिर्भरता पर बल देते हुए बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना की गई, जिसके पहले प्रधानाचार्य और अध्यक्ष क्रमशः अरबिंदो घोष और गुरुदास बनर्जी बनाए गए थे।
4. कांग्रेस के वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन (अध्यक्षता गोपाल कृष्ण गोखले) में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का समर्थन केवल बंगाल तक सीमित रखने का प्रस्ताव पारित हुआ, जबकि चरमपंथियों (लाल-बाल-पाल) की मांग इसे पूरे देश में लागू करने की थी।
→
वर्ष 1857 के महान विद्रोह की असफलता और इसके नेतृत्व की कमियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस विद्रोह का नेतृत्व करने वाले अधिकांश देशी शासकों और सामंतों के पास कोई एकीकृत केंद्रीय दृष्टिकोण या अखिल भारतीय राजनीतिक एजेंडा नहीं था, बल्कि वे मुख्य रूप से अपनी खोई हुई जागीरें और रियासतें वापस पाने के संकीर्ण हितों से प्रेरित थे।
2. नाना साहब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल जैसे प्रमुख नेताओं ने अपनी स्थानीय रियासतों की रक्षा के लिए वीरता से संघर्ष किया, किंतु उनमें परस्पर सामंजस्य और एक सक्षम सर्वोच्च सेनापति का पूर्ण अभाव था जो ब्रिटिश सेनाओं के विरुद्ध संपूर्ण भारत के मोर्चों को समन्वित कर सके।
3. विद्रोहियों के पास आधुनिक हथियारों, संचार प्रणालियों, प्रशिक्षित सैन्य नेतृत्व और निरंतर वित्तीय संसाधनों की भारी कमी थी, जबकि दूसरी ओर ब्रिटिश पक्ष के पास लॉर्ड कैनिंग का कुशल प्रशासनिक निर्देशन, आधुनिक टेलीग्राफ व्यवस्था और नौसेना की सर्वोच्चता जैसे निर्णायक सामरिक लाभ मौजूद थे।
4. शिक्षित भारतीय मध्यम वर्ग, बड़े व्यापारियों और अधिकांश रियासतों के राजाओं (जैसे सिंधिया, होलकर और हैदराबाद के निजाम) ने इस विद्रोह का सक्रिय रूप से समर्थन किया, जिससे ब्रिटिश सत्ता को भारत से खदेड़ने में क्रांतिकारियों को अपार जनबल प्राप्त हुआ था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
→
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था, भूमि अनुदान व्यवस्था और प्रशासनिक संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गुप्त काल में राजाओं द्वारा ब्राह्मणों, मंदिरों और बौद्ध विहारों को कर-मुक्त भूमि या गाँवों के दान (अग्रहार) देने की प्रथा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जिससे स्थानीय स्तर पर एक नए सामंती वर्ग और स्वायत्त प्रशासनिक इकाइयों का उदय हुआ।
2. गुप्त सम्राटों द्वारा बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के (दिनार) जारी किए गए, जो रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार में भारी गिरावट के कारण सोने की मात्रा और शुद्धता में प्रारंभिक गुप्त शासकों के सिक्कों की तुलना में उत्तरवर्ती गुप्त काल में निरंतर कम होते गए।
3. गुप्त प्रशासनिक व्यवस्था में प्रांतीय शासकों को 'उपर्युक्त' (Uparika) कहा जाता था, जो सीधे सम्राट द्वारा नियुक्त होते थे, जबकि जिला प्रशासन का प्रमुख 'विषयपति' कहलाता था जो स्थानीय नगर श्रेष्ठियों और व्यापारियों के सहयोग से शासन चलाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
→
वर्ष 1857 के विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजनीतिक कारणों में लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत का सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) नीति ने सतारा, नागपुर और झांसी जैसी रियासतों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया, जिससे भारतीय शासक वर्ग और उनके आश्रितों में गहरी असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई।
2. सामाजिक और धार्मिक सुधारों के तहत अंग्रेजों द्वारा वर्ष 1856 में पारित 'सामान्य सेवा enlistment अधिनियम' (General Service Enlistment Act) ने सैनिकों के लिए समुद्र पार जाना अनिवार्य कर दिया, जिसे उस समय रूढ़िवादी भारतीय समाज में धर्मभ्रष्ट होने का प्रतीक माना गया।
3. आर्थिक कारणों में अंग्रेजों की भारी भू-राजस्व नीतियों और पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योगों के विनाश ने केवल किसानों और कारीगरों को ही तबाह नहीं किया, बल्कि तालुकदारों और जमींदारों की संपदा छीनने से वे भी ब्रिटिश सत्ता के मुखर विरोधी बन गए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.