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History of India
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक इतिहास और 'नरम दल' तथा 'गरम दल' के वैचारिक संघर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. कांग्रेस के प्रारंभिक उदारवादी (नरम दल) नेताओं का मुख्य विश्वास ब्रिटिश न्यायप्रियता में था और वे क्रमिक सुधारों, प्रार्थना, प्रतिवेदन (Prayer and Petition) तथा विधायिका में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की नीति में विश्वास रखते थे, जिसे अतिवादियों द्वारा 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' (Political Mendicancy) कहा गया।
- 2. वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में प्रारंभ हुए स्वदेशी आंदोलन के दौरान कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आए और वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन हो गया, जहाँ नरमपंथियों ने गरम दल के नेता लाला लाजपत राय को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में चुना।
- 3. वर्ष 1916 के लखनऊ अधिवेशन में डॉ. एनी टिफ़नी (एनी बेसेंट) और लोकमान्य तिलक के प्रयासों से नरम दल और गरम दल का पुनर्मिलन हुआ, तथा इसी अधिवेशन में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच 'लखनऊ पैक्ट' संपन्न हुआ जिसने भविष्य की सांप्रदायिक राजनीति की नींव को मजबूत किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि नरम दल (उदारवादी) के नेता जैसे दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता में विश्वास रखते थे और उनकी कार्यपद्धति प्रार्थना, याचिका और शिष्टमंडल पर आधारित थी, जिसकी उग्र राष्ट्रवादियों (गरम दल) ने आलोचना करते हुए इसे 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' की संज्ञा दी थी। कथन 2 गलत है क्योंकि वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में गरम दल के नेता लोकमान्य तिलक को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, किंतु नरमपंथियों ने रास बिहारी घोष को अध्यक्ष चुना, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस में विभाजन हुआ। कथन 3 सही है क्योंकि 1916 के लखनऊ अधिवेशन में अंबिका चरण मजूमदार की अध्यक्षता में नरम और गरम दल एक हुए तथा कांग्रेस-मुलिम लीग समझौता (लखनऊ पैक्ट) हुआ। इस कालखंड के विस्तृत अध्ययन के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अवध में विद्रोह की शुरुआत 37वीं नेटिव इन्फैंट्री और ओुध रेजिमेंट द्वारा जून 1857 में हुई, जिसके उपरांत बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिश कादिर को नवाब घोषित कर स्वयं शासन की बागडोर संभाली और ब्रिटिश रेजिडेंसी की घेराबंदी का नेतृत्व किया।
2. मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता है, ने फैजाबाद और अवध के विभिन्न क्षेत्रों में ब्रिटिश सेना के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया और चिनहट के युद्ध में हेनरी लॉरेंस के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना को पराजित किया था।
3. ब्रिटिश सेनापति सर कॉलिन कैंपबेल ने भारी सैन्य बल, गोरखा रेजिमेंट और नेपाल के जंगबहादुर की सहायता से मार्च 1858 में लखनऊ पर पुनः अधिकार कर लिया, जिसके पश्चात बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें पेंशन पर कलकत्ता भेज दिया गया।
4. मौलवी अहमदुल्लाह शाह को अंग्रेजों द्वारा पकड़ने के लिए पचास हजार रुपये का भारी इनाम रखा गया था, और अंततः एक स्थानीय जागीरदार (पवाया के राजा) के विश्वासघात के कारण अंग्रेजों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई तथा उनका सिर काटकर सरेआम प्रदर्शित किया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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दीन-ए-इलाही को स्वीकार करने वाला एकमात्र हिंदू दरबारी कौन था?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में विद्रोह का नेतृत्व करने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों—बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह—के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरjis कादिर को अवध का नवाब घोषित कर लखनऊ की रेजिडेंसी पर अधिकार करने वाले विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया और अंत में नेपाल की ओर पलायन कर गईं।
2. मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता था, ने फैजाबाद (अवर) क्षेत्र से विद्रोह का नेतृत्व किया और ब्रिटिश सेना के खिलाफ अपनी बेहतरीन युद्ध रणनीतियों के कारण अंग्रेजों द्वारा उन पर बीस हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया था।
3. ब्रिटिश सेनापति सर कॉलिन कैंपबेल ने नवंबर 1857 में गोरखा रेजिमेंट और अन्य सैन्य टुकड़ियों की सहायता से लखनऊ को अंतिम रूप से विद्रोहियों से पुनः मुक्त कराया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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यूरोपीय कंपनियों के भारत आगमन और बंगाल में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के प्रारंभिक दौर के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में पुर्तगालियों द्वारा स्थापित 'इस्ताद दा इंडिया' (Estado da India) के तहत हिंद महासागर में व्यापारिक जहाजों से 'कार्टाज' (Cartaz) नामक कर वसूला जाता था, तथा अफ़सोस की नीति के अंतर्गत वर्ष 1510 में अल्बुकर्क ने बीजापुर के सुल्तान यूसुफ आदिल शाह से गोवा को छीनकर पुर्तगाली साम्राज्य का मुख्य प्रशासनिक केंद्र बनाया था।
2. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को वर्ष 1600 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा दिए गए शाही चार्टर (राजपत्र) के माध्यम से अनिश्चित काल के लिए पूर्व के साथ व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया गया था, जिसे बाद में जेम्स प्रथम के शासनकाल में सीमित कर दिया गया था।
3. बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए संघर्ष के दौरान, वर्ष 1757 के प्लासी के युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर के साथ गुप्त संधि कर नवाब को पराजित किया, किंतु इस युद्ध के तत्काल पश्चात बंगाल का औपचारिक नवाब मीर जाफर को बनाया गया जिसे अंग्रेजों ने 'कठपुतली नवाब' के रूप में इस्तेमाल किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रारंभिक दार्शनिक विकास एवं संप्रदायों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी वस्त्र धारण करते हैं और उनका यह विश्वास है कि तीर्थंकर मल्लिनाथ एक पुरुष थे, जबकि दिगंबर संप्रदाय के अनुसार मल्लिनाथ एक स्त्री थीं और इस संप्रदाय के साधु पूर्ण नग्नता का व्रत रखते हैं।
2. बौद्ध धर्म की महायान शाखा के उदय के साथ ही बोधिसत्त्वों की संकल्पना को प्रमुखता मिली, जिसमें अवलोकितेश्वर (पद्मपाणि) को सबसे लोकप्रिय बोधिसत्त्व माना गया जिनका मुख्य कार्य संसार के दुःखों को दूर करना और करुणा का प्रसार करना है।
3. जैन धर्म में 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद या सप्तभंगी नय) का सिद्धांत वस्तु के स्वरूप को बहुआयामी और सापेक्षिक दृष्टिकोण से समझने पर बल देता है, जो बौद्ध धर्म के 'प्रतीत्यसमुत्पाद' के सिद्धांत के समान ही कर्मात्मक कारणों की व्याख्या करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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