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History of India
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और जातिगत कठोरताओं का विरोध किया, किंतु इसने पाश्चात्य उदारवादी विचारों और तर्कवाद को अपनाते हुए ईसाई धर्म के नैतिक सिद्धांतों (जैसे 'जीसस के उपदेश') को भी अपने वैचारिक ढांचे में शामिल किया था।
  2. 2. वर्ष 1867 में स्थापित 'प्रार्थना समाज' के संस्थापकों ने महाराष्ट्र की प्राचीन भक्ति परंपरा (जैसे संत ज्ञानेश्वर, एकनाथ और तुकाराम के विचार) को सामाजिक सुधार का आधार बनाया तथा जातिगत भेदभाव, बाल विवाह और अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए निरंतर संघर्ष किया।
  3. 3. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने वेदों की अचूकता और अपौरुषेयता का प्रतिपादन करते हुए मूर्तिपूजा, अवतारवाद, श्राद्ध और जन्मगत जाति व्यवस्था का समर्थन किया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: राजा राममोहन राय द्वारा 1828 में स्थापित विकिपीडिया संदर्भ (ब्रह्म समाज) ने एकेश्वरवाद और उपनिषदों के सार पर बल दिया तथा पश्चिमी उदारवाद और ईसाई नैतिकता के तत्वों को भी अपने दर्शन में समाहित किया। कथन 2 सही है: आत्माराम पांडुरंग द्वारा 1867 में स्थापित प्रार्थना समाज ने महाराष्ट्र की संत परंपरा के मार्ग पर चलते हुए अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और महिला शिक्षा जैसे सुधारों पर विशेष ध्यान दिया। कथन 3 गलत है क्योंकि स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज ने वेदों की सत्ता को स्वीकार किया और 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया, किंतु उन्होंने मूर्तिपूजा, अवतारवाद, श्राद्ध और जन्मगत जाति व्यवस्था का घोर विरोध किया था।
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