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History of India
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के प्रारंभिक वर्षों (1885-1905) और इसके नरमपंथी नेतृत्व के राजनीतिक एवं वैचारिक दृष्टिकोण के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. कांग्रेस के प्रारंभिक नेताओं का यह दृढ़ विश्वास था कि ब्रिटिश शासन भारत के हित में है और वे ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट आस्था रखते हुए 'प्रार्थना, याचिका और विरोध' (Prayer, Petition and Protest) की संवैधानिक पद्धति में विश्वास करते थे।
  2. 2. दादाभाई नौरोजी ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया' के माध्यम से 'धन की निकासी' (Drain of Wealth) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसमें उन्होंने यह स्पष्ट किया कि किस प्रकार औपनिवेशिक नीतियां भारत के आर्थिक शोषण का मुख्य कारण हैं।
  3. 3. वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ गए, जिसके कारण गोपाल कृष्ण गोखले के नेतृत्व में कांग्रेस ने कलकत्ता अधिवेशन (1906) में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक चरण (नरम दल काल) के नेताओं जैसे फिरोजशाह मेहता, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और गोपाल कृष्ण गोखले का ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता में गहरा विश्वास था और वे संवैधानिक दायरे में रहकर अपनी मांगें रखते थे। कथन 2 भी सही है; दादाभाई नौरोजी ने 'धन की निकासी' सिद्धांत के जरिए ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का पर्दाफाश किया था। विकिपीडिया संदर्भ के अनुसार, कथन 3 गलत है क्योंकि 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पहली बार 'स्वराज' के प्रस्ताव का समर्थन किया था और स्वदेशी तथा बहिष्कार आंदोलनों का अनुमोदन किया था, न कि उन्हें खारिज किया था।
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