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History of India
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के द्वितीय चरण, कराची अधिवेशन (1931) और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. वर्ष 1932 में जब महात्मा गांधी ब्रिटेन से द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में असफल होकर लौटे, तो वायसराय लॉर्ड वेलिंगटन ने गांधीजी से मिलने से स्पष्ट इनकार कर दिया और कांग्रेस तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन के पुनः दमन के लिए अध्यादेश (Ordinances) का सहारा लिया।
  2. 2. मार्च 1931 में आयोजित कांग्रेस के कराची अधिवेशन, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, में 'गांधी-इरविन समझौते' को औपचारिक स्वीकृति दी गई तथा पहली बार 'मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक नीति' से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए।
  3. 3. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (सितंबर-दिसंबर 1931) में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया, जहाँ 'कम्युनल अवार्ड' और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के विवाद के कारण सम्मेलन बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: दिसंबर 1931 में जब महात्मा गांधी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से निराश होकर भारत लौटे, तब तक देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका था और लॉर्ड वेलिंगटन वायसराय बन चुके थे। उन्होंने गांधीजी से मिलने से इनकार कर दिया और आंदोलन को कुचलने के लिए दमनकारी अध्यादेश जारी किए। कथन 2 सही है: कराची अधिवेशन (मार्च 1931) की अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, जिसमें गांधी-इरविन समझौते का समर्थन किया गया और मौलिक अधिकारों का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ। कथन 3 गलत है क्योंकि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व (Communal Award) का मुद्दा उठाया गया था, और कम्युनल अवार्ड की घोषणा प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड द्वारा 1932 में की गई थी, न कि सम्मेलन के दौरान ही इसका समाधान निकला। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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