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History of India
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वैदिक साहित्य और समाज के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. ऋग्वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था का आधार जन्म पर आधारित न होकर कर्म और व्यवसाय पर आधारित था, जिसका स्पष्ट प्रमाण नवें मंडल के दसवें सूक्त (पुरुष सूक्त) में मिलता है जहाँ विराट पुरुष के अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है।
  2. 2. उत्तर वैदिक काल में गोत्र प्रथा की संस्था स्थापित हुई, जिसका शाब्दिक अर्थ वह स्थान था जहाँ संपूर्ण कुल का गोधन (गोवंश) एक साथ पाला जाता था, और इस काल में एक ही गोत्र में विवाह करना वर्जित कर दिया गया था।
  3. 3. वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति के संदर्भ में, अपाला, घोषा, विश्ववारा और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना की थी, और वे 'सभा' एवं 'समिति' जैसी राजनीतिक संस्थाओं की बैठकों में भी भाग लेती थीं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि ऋग्वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था के कर्म-आधारित होने का उल्लेख मिलता है (उदाहरणार्थ, ऋग्वेद के नौवें मंडल में एक व्यक्ति का कथन है 'मैं कवि हूँ, मेरा पिता वैद्य है और मेरी माता चक्की पीसने वाली है'), किंतु 'पुरुष सूक्त' जिसमें विराट पुरुष के अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है, वह ऋग्वेद के दसवें मंडल (नवीनतम मंडल) में है, न कि नौवें मंडल में। कथन 2 सही है; उत्तर वैदिक काल में गोत्र व्यवस्था का उदय हुआ और सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया गया। कथन 3 सही है; ऋग्वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत उन्नत थी, जहाँ अपाला, घोषा, विश्ववारा और लोपामुद्रा जैसी विदुषी स्त्रियों (ब्रह्मवादिनी) ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की और वे 'सभा' व 'समिति' जैसी संस्थाओं में भी भाग लेती थीं। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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