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History of India
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वर्धन राजवंश तथा दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की राजनीतिक संरचना, प्रशासनिक व्यवस्था और उपाधि परंपराओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. पल्लव शासक महेंद्रवमन् प्रथम ने अपने प्रारंभिक जीवन में जैन धर्म का अनुयायी होने के बावजूद संत अप्पर के प्रभाव में आकर शैव धर्म स्वीकार किया था, तथा उसने 'मत्तविलास प्रहसन' जैसे संस्कृत नाटक की रचना की और 'विचित्राचित्त', 'गुणभाड़' जैसी उपाधियाँ धारण की थीं।
- 2. बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को पराजित किया था, जिसकी पुष्टि अहोल प्रशस्ति से होती है, और इस प्रशस्ति की रचना जैन कवि रवि कीर्ति द्वारा की गई थी जो संस्कृत काव्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- 3. चोल साम्राज्य की स्थानीय स्वशासन प्रणाली, विशेषकर उत्तरमेरूर अभिलेखों में वर्णित ग्राम सभाओं और समितियों (कुटुम्ब) के चुनाव के लिए 'कुरावोलै' (पॉट-टिकट या पर्ची प्रणाली) का उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार महिलाओं को भी इन प्रशासनिक समितियों में मतदान और चुनाव लड़ने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था।
- 4. राष्ट्रकूट शासक ध्रुव और गोपाल (पाल वंश) के साथ त्रिपक्षीय संघर्ष में उलझने वाले पल्लव शासक नन्दिवर्मन् द्वितीय ने महाबलीपुरम के प्रसिद्ध 'वैकुंठ पेरुमल मंदिर' का निर्माण करवाया था, जो विष्णु को समर्पित है और इसकी दीवारों पर पल्लव इतिहास के दृश्यों का उत्कीर्णन मिलता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1, 2 और 4 सही हैं। पल्लव नरेश महेंद्रवर्मन् प्रथम ने 'मत्तविलास प्रहसन' की रचना की और पुलकेशिन द्वितीय द्वारा हर्षवर्धन को नर्मदा के तट पर हराने का उल्लेख रवि कीर्ति रचित अहोल प्रशस्ति में मिलता है। नन्दिवर्मन् द्वितीय ने महाबलीपुरम के वैकुंठ पेरुमल मंदिर का निर्माण कराया था। किंतु कथन 3 असत्य है क्योंकि चोल साम्राज्य के उत्तरमेरूर अभिलेखों के अनुसार ग्राम सभाओं और वारियम (समितियों) के चुनाव के लिए पात्र होने के लिए कठोर नियम थे, जिनमें महिलाओं को मतदान या चुनाव लड़ने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। संदर्भ के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
Related Questions
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मुगलकालीन केंद्रीय एवं प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अकबर के शासनकाल में स्थापित 'दीवान-ए-कुल' (Financial Head) केंद्रीय वित्त विभाग का प्रमुख होता था, जो आय-व्यय के विवरण के साथ-साथ साम्राज्य की समस्त जागीर और खालसा भूमि के वित्तीय लेन-देन पर नियंत्रण रखता था।
2. जहांगीर के शासनकाल में प्रांतीय स्तर पर 'दीवान' के अधिकारों को और अधिक सीमित कर दिया गया तथा प्रांतीय फौजदार को सीधे सम्राट के प्रति उत्तरदायी बनाते हुए दीवान की नियुक्ति पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
3. शाहजहां के शासनकाल के दौरान प्रशासनिक सुधारों के तहत 'मशरुत' (सशर्त पद) व्यवस्था को लागू किया गया, जिसके अंतर्गत किसी मनसबदार को उसके निर्धारित जात पद से अधिक सवार पद रखने की अनुमति दी जाती थी।
4. औरंगजेब के शासनकाल में धार्मिक मामलों, दान-दक्षिणा और न्याय व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए 'सद्र-उस-सुदूर' (Sadr-us-Sudur) विभाग अत्यधिक प्रभावशाली था, और इस काल में इकरारनामों एवं फतवों के संकलन के लिए 'फतवा-ए-आलमगिरी' का निर्माण कराया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की प्रकृति और उसके वैचारिक स्वरूप के संदर्भ में विभिन्न ब्रिटिश और भारतीय विचारकों तथा इतिहासकारों द्वारा दिए गए प्रसिद्ध वक्तव्यों एवं मतों पर विचार कीजिए:
1. सर जॉन सीले (Sir John Seeley) ने 1857 के विद्रोह को 'पूरी तरह से देशभक्तिहीन और स्वार्थी सिपाही विद्रोह' (An entirely patriotic and selfish sepoy mutiny) करार दिया था, जिसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति था।
2. बेंजामिन डिजरायली (Benjamin Disraeli) ने ब्रिटिश संसद में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में इस घटना को केवल एक साधारण सैनिक विद्रोह न मानकर इसे 'राष्ट्रीय विद्रोह' (National Revolt) की संज्ञा दी थी।
3. वी.डी. सावरकर (V.D. Savarkar) ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' में इस महान घटना को सुनियोजित 'प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम' के रूप में चित्रित किया।
4. एस.एन. सेन (S.N. Sen) ने अपनी आधिकारिक पुस्तक '1857' में यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया कि यह विद्रोह 'धर्म के नाम पर शुरू हुआ युद्ध था और अंततः स्वतंत्रता संग्राम के रूप में समाप्त हुआ'।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और उनके वैचारिक तथा संस्थागत विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' (1828) ने एकेश्वरवाद का प्रचार किया और मूर्तिपूजा, अवतारवाद तथा पुरोहितवाद का कड़ा विरोध किया, किंतु इसके संस्थापक ने एकेश्वरवाद के समर्थन में प्राचीन वेदों और उपनिषदों के तार्किक अध्ययन के साथ-साथ यूरोपीय рационаलिज्म (तर्कवाद) का भी समन्वय किया था।
2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' (1875) ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और वेदों को अपौरुषेय एवं अचूक मानते हुए मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, बाल विवाह तथा छुआछूत का जोरदार खंडन किया, साथ ही धर्म-परिवर्तित हिंदुओं की वापसी के लिए 'शुद्धि आंदोलन' की शुरुआत की।
3. केशव चंद्र सेन के नेतृत्व में ब्रह्म समाज में हुए वैचारिक मतभेदों के परिणामस्वरूप वर्ष 1866 में ब्रह्म समाज का प्रथम विभाजन हुआ, जिसके बाद देवेंद्रनाथ टैगोर ने 'आदि ब्रह्म समाज' का नेतृत्व किया, जबकि केशव चंद्र सेन ने 'भारतीय ब्रह्म समाज' (Brahmo Samaj of India) की स्थापना की।
4. प्रार्थना समाज की स्थापना वर्ष 1867 में बंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा की गई थी, जिसे महादेव गोविंद रानाडे और आर.जी. भंडारकर जैसे सुधारकों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ, और इस संस्था का मुख्य ध्यान धार्मिक सुधारों की तुलना में सामाजिक सुधारों (जैसे विधवा पुनर्विवाह और अंतरजातीय विवाह) पर अधिक केंद्रित था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन और तदुपरांत आरंभ हुए स्वदेशी आंदोलन के वैचारिक, आर्थिक तथा संगठनात्मक पहलुओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल विभाजन के विरोध में कलकत्ता के टाउन हॉल में 7 अगस्त 1905 को आयोजित ऐतिहासिक बैठक में प्रसिद्ध 'बहिष्कार प्रस्ताव' पारित किया गया, जिसके तहत केवल ब्रिटिश वस्त्रों और नमक के बहिष्कार पर बल दिया गया था, जबकि ब्रिटिश अदालतों, स्कूलों और उपाδειयों के बहिष्कार का इसमें कोई उल्लेख नहीं था।
2. स्वदेशी आंदोलन के दौरान आर्थिक आत्मनिर्भरता (आत्मशक्ति) पर विशेष जोर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने 'बंगाल केमिकल एंड फार्मास्युटिकल वक्र्स' जैसी स्वदेशी उद्योगों की नींव रखी, तथा राष्ट्रीय शिक्षा की दिशा में 'नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन' की स्थापना की गई।
3. स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव केवल कलकत्ता और बड़े शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका विस्तार बंगाल के ग्रामीण इलाकों तक भी हुआ, जहाँ अश्विनी कुमार दत्त द्वारा 'स्वदेश बांधव समिति' के माध्यम से किसानों और आम जनता को संगठित किया गया तथा मेलों व लोक-उत्सवों को जन-जागरण का माध्यम बनाया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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मुगल काल में "सराफ" (Saraf) किन्हें कहा जाता था जो मुद्रा के विनिमय और बैंकिंग का कार्य करते थे?
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