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History of India
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मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था, मनसबदारी प्रणाली और उसकी विभिन्न विशेषताओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. अकबर द्वारा प्रारंभ की गई मनसबदारी प्रणाली में 'जात' और 'सवार' पद यह निर्धारित करते थे कि अधिकारी का व्यक्तिगत दर्जा क्या है और उसे अपने सैन्य दस्ते में कितने घुड़सवार रखने होंगे, जिसमें 'दुस्पासिह-सिंहस्पा' प्रणाली को बाद में शाहजहां द्वारा जोड़ा गया था।
- 2. जहाँगीर के शासनकाल में 'मदद-इ-माश' (या सयूरगल) के अंतर्गत विद्वानों और धार्मिक व्यक्तियों को दी जाने वाली कर-मुक्त भूमि की जाँच करने और उसे जब्त करने के लिए 'सद्र-उस-सुदूर' विभाग का विशेष पुनर्गठन किया गया था।
- 3. शाहजहां के शासनकाल में भू-राजस्व निर्धारण के लिए 'दहशाल' (या ज़ब्ती) पद्धति को पूरे साम्राज्य में और अधिक कठोरता से लागू किया गया, तथा फसल के नुकसान के आकलन के लिए पारंपरिक 'नस्क' या 'बटाई' प्रणाली को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया था।
- 4. औरंगजेब के शासनकाल में 'फतावा-ए-आलमगिरी' का संकलन कराया गया, जो हनफी विधि (Islamic jurisprudence) पर आधारित एक व्यापक इस्लामी कानून का ग्रंथ था, और इसी काल में उसने हिंदू मंदिरों के विध्वंस के साथ-साथ पुनः 'जिजिया' कर लगाया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि 'दुस्पासिह-सिंहस्पा' (Du-aspa Sih-aspa) प्रणाली को शाहजहां ने नहीं, बल्कि जहाँगीर ने अपनी मनसबदारी व्यवस्था में जोड़ा था जिसके तहत मनसबदारों को बिना जात रैंक बढ़ाए अतिरिक्त घोड़े रखने की अनुमति मिलती थी। कथन 2 सही है; जहाँगीर ने मदद-इ-माश भूमि की सत्यता और उसके दुरुपयोग की जाँच के लिए कदम उठाए थे। कथन 3 गलत है क्योंकि शाहजहां के काल में भी 'नस्क' (बटाई) प्रणाली पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं थी, बल्कि ज़ब्ती के साथ-साथ इसका भी उपयोग होता था। कथन 4 बिल्कुल सही है, औरंगजेब के शासनकाल में फतावा-ए-आलमगिरी का संकलन हुआ और 1679 में जिजिया कर पुनः लगाया गया। विस्तृत ऐतिहासिक संदर्भ के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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मनसबदारी व्यवस्था में "सवार" शब्द का क्या अर्थ था?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के उदय के लिए उत्तरदायी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक-धार्मिक कारणों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लॉर्ड डलहौजी की 'राज्य हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) के अंतर्गत सतारा, नागपुर और झाँसी के अतिरिक्त अवध का विलय भी कुशासन के आधार पर किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप अवध के सैनिकों और नवाब के आश्रितों में भारी आक्रोश उत्पन्न हुआ और इसे 'अटॉर्नी जनरल की फौज' के रूप में देखा गया।
2. ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के कारण भारत के पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योगों का तीव्र पतन हुआ, जिससे लाखों बुनकर और कारीगर बेरोजगार होकर कृषि पर आश्रित हो गए, और ब्रिटिश भू-राजस्व प्रणालियों (स्थायी बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी) ने कृषकों को भारी कर के बोझ तले दबाकर ग्रामीण साहूकारों और महाजनों के चंगुल में फंसा दिया।
3. वर्ष 1850 के 'धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) ने हिंदू से ईसाई धर्म में परिवर्तित व्यक्तियों को अपने पैतृक पूर्वजों की संपत्ति से वंचित करने वाले पुराने कानून को बदल दिया, जिसे रूढ़िवादी भारतीयों ने ईसाई धर्म के प्रचार और जबरन धर्मांतरण के एक सुनियोजित षड्यंत्र के रूप में देखा।
4. सेना के भीतर नस्लीय भेदभाव, भारतीय सैनिकों को कम वेतन और विदेशी सेवा भत्ता (Foreign Service Allowance) से वंचित करने की नीति के साथ-साथ वर्ष 1856 के 'सामान्य सेना Enlistment अधिनियम' ने, जिसके तहत भारतीय सैनिकों को आवश्यकता पड़ने पर समुद्र पार भी सेवा देने के लिए बाध्य किया गया था, सिपाहियों की धार्मिक भावनाओं को सीधे तौर पर आहत किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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1857 के महान विद्रोह के दौरान बिहार के विभिन्न क्षेत्रों—विशेषकर पटना, दानापुर, आरा, मुजफ्फरपुर और छपरा—में हुई गतिविधियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पटना सिटी में 3 जुलाई 1857 को हुए विद्रोह का नेतृत्व पीर अली खान नामक एक पुस्तक विक्रेता ने किया था, जिनके घर पर क्रांतिकारी परचे और झंडे मिले थे, तथा कमिश्नर विलियम टेलर के आदेश पर उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई थी।
2. दानापुर छावनी के 7वीं, 8वीं और 40वीं रेजिमेंट के सिपाहियों ने 25 जुलाई 1857 को विद्रोह कर दिया और सोन नदी पार कर जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से जा मिले, जिससे इस क्षेत्रीय संघर्ष को एक राष्ट्रीय आयाम मिला।
3. मुजफ्फरपुर और छपरा (सारण) क्षेत्रों में विद्रोह का प्रसार करने में स्थानीय जमींदारों के साथ-साथ दानापुर से आए विद्रोही सैनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, तथा छपरा में विद्रोहियों ने सरकारी खजाने पर अधिकार कर जेल तोड़कर बंदियों को रिहा कर दिया था।
4. दानापुर के सैनिकों के विद्रोह के बाद ब्रिटिश कमिश्नर विलियम टेलर ने पटना के तीन प्रमुख वहाबी नेताओं—मौलाना अहमदुल्लाह, शाह मुहम्मद हुसैन और वाइज उल हक—को बातचीत के बहाने पटना में गिरफ्तार कर नजरबंद कर लिया था, जिससे शहर में तीव्र आक्रोश फैल गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान झांसी और ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के सैन्य अभियानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मार्च 1858 में सर ह्यूरोज के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना द्वारा झांसी के दुर्ग की घेराबंदी किए जाने के बाद, रानी लक्ष्मीबाई ने अत्यंत साहस के साथ युद्ध किया और कालपी की ओर प्रस्थान कर गईं, जहाँ उन्होंने तात्या टोपे के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना के विरुद्ध एक मजबूत प्रतिरोध संगठित किया।
2. ग्वालियर के पतन के बाद तात्या टोपे ने आत्मसमर्पण कर दिया, जबकि रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों के विरुद्ध अंतिम संघर्ष करते हुए जून 1858 में ग्वालियर के पास वीरगति को प्राप्त हुईं।
3. ग्वालियर पर अधिकार करने के बाद रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने सिंधिया राजवंश के शासक जयाजीराव सिंधिया को अपने पक्ष में करने में पूर्ण सफलता प्राप्त कर ली थी, जिससे उन्हें मराठा साम्राज्य के पुनरुद्धार में अपार सहायता मिली।
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भक्ति आंदोलन और सूफी सिलसिले के दार्शनिक तथा ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दक्षिण भारत के अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी थी, और इनकी भक्ति परंपरा में जाति और लिंग के भेदभाव का कड़ाई से पालन करते हुए शूद्रों तथा महिलाओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था।
2. बारहवीं शताब्दी में बंगाल में उत्पन्न 'अचिन्त्य भेदभेदवाद' के प्रस्तावक चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तन पद्धति के माध्यम से भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया और प्रेम तथा आनंद के मार्ग को मोक्ष का मुख्य साधन बताया।
3. सूफी संतों का 'वह्दत-उल-वुजूद' (अस्तित्व की एकता) का सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि सृष्टिकर्ता (अल्लाह) और उसकी रचना (ब्रह्मांड) मूलतः एक ही हैं, जिसकी दार्शनिक व्याख्या आगे चलकर इब्न अल-अरबी द्वारा की गई थी।
4. चिश्ती सिलसिले के प्रसिद्ध संत निजामुद्दीन औलिया ने राजकीय संरक्षण और सुल्तानों के दरबार में उपस्थिति को अनिवार्य मानते हुए दिल्ली सल्तनत के कई पदों को स्वीकार किया था ताकि इस्लाम के प्रसार में मदद मिल सके।
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