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History of India
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान और उसके उपरांत हुए राजनीतिक घटनाक्रमों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया, किंतु भारत के अन्य राजनीतिक दलों जैसे मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, और दलित वर्ग के प्रतिनिधियों (बी. आर. अंबेडकर और तेज बहादुर सप्रू सहित) ने भाग लिया था।
- 2. मार्च 1931 में संपन्न गांधी-इरविन समझौते के तहत सरकार द्वारा राजनीतिक कैदियों (हिंसा में लिप्त कैदियों को छोड़कर) को रिहा करने तथा समुद्र तट के पास बिना कर के नमक बनाने की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की गई थी, किंतु कांग्रेस द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन को पूर्ण रूप से स्थगित करने की घोषणा नहीं की गई थी।
- 3. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया, किंतु सम्मेलन के दौरान सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के विवाद के कारण यह सम्मेलन बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गया।
- 4. सांप्रदायिक पंचाट (Communal Award) और पूना पैक्ट (1932) के उपरांत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को औपचारिक रूप से समाप्त करने का निर्णय लिया और वर्ष 1934 में संगठन को पूरी तरह भंग कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930 - जनवरी 1931) में कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण भाग नहीं लिया था, लेकिन मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, रियासतों के प्रतिनिधियों तथा बी. आर. अंबेडकर और तेज बहादुर सप्रू जैसे उदारवादी नेताओं ने इसमें भाग लिया था। कथन 2 गलत है क्योंकि गांधी-इरविन समझौते के तहत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को 'स्थगित' (Suspend) करने पर सहमति व्यक्त की थी, न कि जारी रखने पर। कथन 3 सही है, महात्मा गांधी ने कराची अधिवेशन के बाद कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था, जो सांप्रदायिक और संवैधानिक गतिरोध के कारण असफल रहा। कथन 4 गलत है क्योंकि मई 1934 में कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को औपचारिक रूप से वापस लिया था, किंतु पार्टी को भंग नहीं किया गया था। इस ऐतिहासिक कालखंड के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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वर्धन राजवंश एवं दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव शासक महेंद्रवमन् प्रथम ने अपने प्रारंभिक जीवन में जैन धर्म का अनुयायी होने के बाद, तमिल संत अप्पर (थिरुनुवुक्करासर) के प्रभाव से शैव धर्म अपना लिया था, तथा महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म 'रथ मंदिरों' (मंडप और रथ) के निर्माण की शुरुआत उसी के काल में हुई थी।
2. बादामी के चालुक्य वंश के महान शासक पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन की उत्तर भारत की विजय यात्रा को रोककर उसे पराजित किया था, और इस ऐतिहासिक घटना का विस्तृत उल्लेख हमें एहोल शिलालेख में मिलता है, जिसकी रचना रविचर्ति ने की थी।
3. चोल राजवंश की सुदृढ़ स्थानीय स्वशासन प्रणाली, विशेष रूप से 'उत्तरमेरूर शिलालेख' (Uttiramerur Inscriptions), में ग्राम सभाओं (कुडम) के गठन, सदस्यों की योग्यता, अयोग्यता और पर्ची प्रणाली (कुरावोलै पद्धति) के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है।
4. वर्धन वंश के शासक हर्षवर्धन के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया था, जिसने कन्नौज की भव्य धर्मसभा और प्रयागराज की महामोक्ष परिषद का अपनी यात्रा वृत्तांत 'सी-यु-की' में सजीव वर्णन किया है, तथा हर्षवर्धन ने स्वयं 'रत्नावली', 'प्रियदर्शिका' और 'नागानंद' जैसे नाटकों की रचना की थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के पश्चात ब्रिटिश क्राउन द्वारा लाए गए भारत सरकार अधिनियम 1858 और 'क्वीन विक्टोरिया की घोषणा' (1 नवंबर 1858) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के तहत भारत के नियंत्रण के लिए ब्रिटिश मंत्रिमंडल में 'भारत के राज्य सचिव' (Secretary of State for India) के नए पद का सृजन किया गया, जिसे सहायता प्रदान करने के लिए 15 सदस्यीय 'भारत परिषद' (Council of India) का गठन किया गया, जिसके आधे सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटिश संसद द्वारा और आधे सदस्यों की नियुक्ति क्राउन द्वारा की जाती थी।
2. इलाहाबाद में आयोजित दरबार में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पढ़ी गई क्वीन विक्टोरिया की घोषणा में यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय रियासतों के साथ पूर्व में की गई संधियों और अनुबंधों का सम्मान करेगी और भविष्य में किसी भी भारतीय राज्य का विलय नहीं किया जाएगा।
3. घोषणा में यह भी स्पष्ट किया गया कि धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा तथा नस्ल, जन्म या धर्म के भेदभाव के बिना सभी भारतीयों को उनकी योग्यता के आधार पर उच्च सरकारी सेवाओं में नियुक्त किया जाएगा।
4. विद्रोह के बाद सेना का पुनर्गठन करते हुए ब्रिटिश सरकार ने बंगाल प्रेसिडेंसी में यूरोपीय और भारतीय सैनिकों का अनुपात 1:2 कर दिया, जबकि मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसी में यह अनुपात 1:3 रखा गया, ताकि भविष्य में इस प्रकार के सैन्य विद्रोहों को रोका जा सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और सुभाष चंद्र बोस से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित हुआ, और इस आंदोलन की शुरुआत के साथ ही महात्मा गांधी ने 'करो या मरो' (Do or Die) का आह्वान किया था।
2. सुभाष चंद्र बोस ने वर्ष 1939 में त्रिपुरी संकट के उपरांत कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने के बाद 'फॉरवर्ड ब्लॉक' की स्थापना की थी, तथा वे भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के भीतर रहकर इस आंदोलन के मुख्य भूमिगत संचालक के रूप में कार्य कर रहे थे।
3. आज़ाद हिंद फौज (INA) की स्थापना मूल रूप से कैप्टन मोहन सिंह के प्रयासों से हुई थी, जिसे बाद में रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में पुनर्गठित किया गया तथा सिंगापुर में 'अर्जी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद' की स्थापना की गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की क्रांतिकारी भूमिका तथा उनके संघर्ष के ऐतिहासिक संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अवध में विद्रोह की शुरुआत 30 जून 1857 को चिनहट के युद्ध में ब्रिटिश रेजिडेंट हेनरी लॉरेंस की पराजय के साथ हुई, जहाँ स्थानीय जनता और सैनिकों ने बेगम हजरत महल के नेतृत्व में ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दी थी।
2. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादिर को अवध का नवाब घोषित कर प्रशासनिक और सैन्य संचालन अपने हाथों में लिया, तथा लखनऊ की रेजिडेंसी की लंबी घेराबंदी के दौरान ब्रिटिश सेनाओं को घोर कठिनाइयों में डाला।
3. फैजाबाद से अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने वाले मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता था, ने ब्रिटिश सेना के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया और कैंपबेल तथा आउट्राम की संयुक्त सेनाओं को कड़ा मुकाबला दिया था।
4. लखनऊ के अंतिम पतन के उपरांत बेगम हजरत महल ने ब्रिटिश सेनाओं के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और आजीवन ब्रिटिश पेंशन स्वीकार कर कलकत्ता में निवास किया, जबकि मौलवी अहमदुल्लाह शाह को पुवायाँ के राजा के विश्वासघात के बाद अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक विकास, सैन्य सुधार और विभिन्न विभागों के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. दीवान-ए-मुस्तखराज - अलाउद्दीन खिलजी द्वारा स्थापित, जिसका मुख्य कार्य भू-राजस्व के बकाया की जाँच करना और भ्रष्ट राजस्व अधिकारियों से धन वसूलना था।
2. दीवान-ए-कोही - मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा स्थापित कृषि विभाग, जिसका उद्देश्य दोआब क्षेत्र में बंजर भूमि को प्रत्यक्ष राजकीय नियंत्रण में लाकर खेती का विस्तार करना था।
3. दीवान-ए-अर्ज - बलबन द्वारा पुनर्गठित सैन्य विभाग, जिसका प्रमुख 'आरीज़-ए-मुमालिक' होता था और इसका कार्य सेना का रख-रखाव व सैनिकों का हुलिया दर्ज करना था।
4. दीवान-ए-खैरात - फिरोजशाह तुगलक द्वारा स्थापित दान विभाग, जिसका उद्देश्य मुस्लिम अनाथों और विधवाओं को आर्थिक सहायता तथा गरीब लड़कियों के विवाह की व्यवस्था करना था।
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से युग्म सही सुमेलित हैं?
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