BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

History of India
17 views

प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दर्शन, सिद्धांतों एवं उनके आयोजनों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. बौद्ध धर्म के मध्यम प्रतिपदा (अष्टांगिक मार्ग) और जैन धर्म के स्याद्वाद (अनेकांतवाद) दोनों ही दर्शन अतिवादी तपस्या और भोग-विलासिता दोनों का त्याग करते हुए कर्म के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, किंतु जैन धर्म आत्मा के अस्तित्व को अनिवार्य मानता है जबकि बौद्ध धर्म 'अनात्मवादी' (अनित्य और आत्मा के अस्तित्व को न मानने वाला) है।
  2. 2. जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए 'त्रिरत्न' (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र) का पालन अनिवार्य बताया गया है, जबकि बौद्ध धर्म के त्रिरत्न 'बुद्ध, धम्म और संघ' हैं।
  3. 3. बौद्ध धर्म की प्रथम संगीति का आयोजन राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में अजातशत्रु के संरक्षण में हुआ था, जिसकी अध्यक्षता महाकस्सप ने की थी और इसी संगीति में सुत्तपिटक तथा विनयपिटक का संकलन किया गया था।
  4. 4. जैन धर्म की प्रथम संगीति पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में हुई थी, जिसमें जैन ग्रंथों के संकलन हेतु 'द्वादशांगी' का अंतिम रूप से संपादन हुआ और श्वेतांबर तथा दिगंबर संप्रदायों के बीच स्थायी मतभेद समाप्त हो गए।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और सही हैं। बौद्ध धर्म 'अनात्मवादी' (Anatta) है अर्थात् यह स्थायी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता, जबकि जैन धर्म प्रत्येक जीव में जीव (आत्मा) की उपस्थिति मानता है। बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों के त्रिरत्न और उनकी संगीतियों से जुड़े तथ्य ऐतिहासिक रूप से सही हैं। हालांकि, कथन 4 गलत है क्योंकि पाटलिपुत्र की प्रथम जैन संगीति में श्वेतांबर और दिगंबर के बीच के मतभेद समाप्त नहीं हुए थे, बल्कि इसी संगीति के दौरान जैन धर्म दो प्रमुख शाखाओं (श्वेतांबर और दिगंबर) में स्पष्ट रूप से विभाजित हो गया था। बौद्ध और जैन दर्शन के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Share:

Related Questions

→ इब्न बतूता द्वारा लिखित प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांत (Travelogue) का नाम क्या है? → बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय और जैन धर्म के श्वेतांबर/दिगंबर संप्रदायों के दार्शनिक तथा अनुष्ठानिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. महायान बौद्ध धर्म में बुद्ध को एक अलौकिक देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया तथा 'बोधिसत्व' की अवधारणा का उदय हुआ, जिसके तहत अन्य प्राणियों के उद्धार के लिए अपने निर्वाण को स्थगित करने वाले प्राणियों की परिकल्पना की गई, जबकि हिनयान (स्थविरवाद) में बुद्ध की पूजा एक महापुरुष के रूप में प्रतीकों के माध्यम से की जाती थी। 2. जैन धर्म के दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी वस्त्र त्यागने को मोक्ष प्राप्ति के लिए अनिवार्य मानते हैं और उनका यह विश्वास है कि स्त्रियाँ इस जन्म में सीधे मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं, जबकि श्वेतांबर संप्रदाय के लोग सफेद वस्त्र धारण करते हैं और उनका मानना है कि स्त्री शरीर से भी मोक्ष संभव है, तथा उनके अनुसार उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ एक स्त्री थीं। 3. बौद्ध धर्म की महायान शाखा का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक आधार नागार्जुन द्वारा प्रतिपादित 'शून्यवाद' (माध्यमिक दर्शन) था, जिसके अनुसार सभी वस्तुएं और धर्म स्वभाव से शून्य (प्रतीतसमुत्पाद पर आधारित सापेक्ष) हैं, जबकि जैन धर्म का 'अनेकांतवाद' सत्य को बहुआयामी मानता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? → औरंगजेब के कितने पुत्र थे? → महात्मा गांधी के प्रारंभिक आंदोलनों—चंपारण सत्याग्रह (1917), अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918) और खेड़ा सत्याग्रह (1918)—के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. चंपारण सत्याग्रह के दौरान यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा किसानों पर लागू 'तिनकठिया' प्रणाली के तहत प्रत्येक बीघा जमीन के तीन कट्ठा हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था, जिसके विरुद्ध गांधीजी ने पहली बार भारत में 'सविनय अवज्ञा' का सफल प्रयोग किया था। 2. अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन में गांधीजी ने प्लेग बोनस को लेकर मिल मालिकों और मजदूरों के बीच चल रहे विवाद में मजदूरों की हड़ताल का समर्थन करते हुए भारतीय इतिहास में पहली बार 'आमरण अनशन' (Hunger Strike) का एक हथियार के रूप में प्रयोग किया था। 3. खेड़ा सत्याग्रह में फसल का उत्पादन सामान्य उत्पादन के एक-चौथाई से भी कम होने के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन द्वारा राजस्व वसूलने के निर्णय के खिलाफ, गांधीजी और सरदार वल्लभभाई पटेल ने किसानों को 'लगान न चुकाने' (No-Tax Campaign) का स्पष्ट निर्देश दिया था। 4. इन तीनों शुरुआती आंदोलनों में सफलता प्राप्त करने के पश्चात महात्मा गांधी ने वर्ष 1919 में रौलट एक्ट के विरोध में अखिल भारतीय स्तर पर एक शक्तिशाली 'रौलट सत्याग्रह' का आयोजन किया, जो पूरी तरह से अहिंसक और सफल रहा तथा देश के किसी भी कोने में कोई हिंसा नहीं हुई। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? → वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरjis कादिर को अवध का नवाब घोषित कर लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व किया और ब्रिटिश सेना के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध का संचालन किया। 2. मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता था, ने फैजाबाद और रोहिलखंड क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया तथा ब्रिटिश सेनापतियों को अपनी उत्कृष्ट सैन्य रणनीति से कड़ी चुनौती दी। 3. ब्रिटिश सेना द्वारा लखनऊ पर पुनः अधिकार किए जाने के पश्चात बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें पेंशन पर कलकत्ता में रहने की अनुमति दे दी गई, जबकि अहमदुल्लाह शाह को एक स्थानीय राजा द्वारा विश्वासघात किए जाने के कारण अंग्रेजों ने मार डाला। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.