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History of India
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक इतिहास तथा नरम दल और गरम दल के वैचारिक संघर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. कांग्रेस के शुरुआती वर्षों (1885-1905) में नरमपंथियों की कार्यप्रणाली मुख्य रूप से 'प्रार्थना, याचिका और विरोध' (Pray, Petition and Protest) की संवैधानिक राजनीति पर आधारित थी, और उन्होंने ब्रिटिश शासन को भारत के आधुनिकीकरण के लिए एक वरदान के रूप में देखा था।
- 2. वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात उग्रवादी (गरम दल) नेताओं—लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) और अरविंद घोष ने स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को केवल बंगाल तक सीमित रखने का समर्थन किया था, जबकि अखिल भारतीय स्तर पर इसके विस्तार का कड़ा विरोध किया था।
- 3. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के नरम दल और गरम दल के बीच अध्यक्ष पद के चुनाव और वैचारिक मतभेदों के कारण ऐतिहासिक विभाजन हो गया, जिसमें नरमपंथियों की ओर से रास बिहारी घोष को अध्यक्ष चुना गया था।
- 4. बाल गंगाधर तिलक ने जनता में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने के लिए वर्ष 1893 में 'गणेश उत्सव' और वर्ष 1895 में 'शिवाजी उत्सव' की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य पारंपरिक धार्मिक आयोजनों के माध्यम से राजनीतिक संवाद स्थापित करना था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई थी और इसके शुरुआती दौर में नरमपंथियों का वर्चस्व रहा। नरमपंथी नेताओं की राजनीति ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट विश्वास पर टिकी थी। इसके विपरीत, गरम दल (उग्रवादी) ने ब्रिटिश साम्राज्य के समक्ष केवल प्रार्थना करने की नीति को नकार दिया और आत्म-निर्भरता, स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा पर जोर दिया। लाल-बाल-पाल और अरविंद घोष ने स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे पूरे देश में फैलाने का प्रयास किया, जिससे कथन 2 गलत हो जाता है। वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस नरम और गरम दलों में विभाजित हो गई और रास बिहारी घोष इसके अध्यक्ष बने थे। इस कालखंड के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
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मुगल साम्राज्य के प्रशासनिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जहाँगीर के शासनकाल में मुगल चित्रकला अपने स्वर्ण काल पर पहुँची, जिसमें प्राकृतिक दृश्यों, पक्षियों और पोर्ट्रेट चित्रकारी को विशेष प्रोत्साहन मिला, तथा जहाँगीर का दावा था कि वह किसी भी चित्र को देखकर यह बता सकता है कि उसे किस चित्रकार ने बनाया है।
2. शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान वास्तुकला ने अपनी पराकाष्ठा को छुआ, किंतु उसके अंतिम वर्षों में उसके पुत्रों के बीच हुए उत्तराधिकार के युद्ध में दाराशिकोह ने सामूगढ़ के निर्णायक युद्ध में औरंगजेब को पराजित कर मुगल सिंहासन पर अधिकार कर लिया था।
3. औरंगजेब ने अपने शासनकाल के दौरान संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया, झरोखा दर्शन और तुलादान जैसी मुगल परंपराओं को समाप्त कर दिया, तथा सिक्कों पर कलमा खुदवाने की प्रथा को भी बंद करवा दिया था।
4. अकबर द्वारा शुरू की गई 'दीन-ए-इलाही' वस्तुतः कोई नया धर्म नहीं था, बल्कि यह सूफीवादी विचारों पर आधारित एक आचार संहिता थी जिसका प्रधान पुरोहित अबुल फजल था और बीरबल एकमात्र हिंदू दरबारी था जिसने इसे स्वीकार किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मराठा प्रशासन में पत्राचार विभाग के प्रमुख को क्या कहा जाता था?
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'नरम दल' और 'गरम दल' के वैचारिक संघर्ष तथा उनके राजनीतिक कार्यक्रमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन में कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए, जहाँ गरम दल के नेताओं ने स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को पूरे देश में फैलाने की मांग की, जबकि गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में नरमपंथियों ने इसे केवल बंगाल तक सीमित रखने और ब्रिटिश सरकार के प्रति संयमित विरोध का रुख अपनाने का समर्थन किया।
2. वर्ष 1906 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस का विभाजन टल गया, क्योंकि उनके अध्यक्षीय भाषण में पहली बार आधिकारिक रूप से 'स्वराज' (Swaraj) को कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य घोषित किया गया था।
3. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के दोनों धड़ों के बीच अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर हिंसक झड़पें हुईं, जिसके परिणामस्वरूप रास बिहारी बोस की अध्यक्षता में गरम दल के नेताओं को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया और यह विभाजन लखनऊ पैक्ट (1916) तक बना रहा।
4. गरम दल के प्रमुख नेताओं—बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल (जिन्हें 'लाल-बाल-पाल' कहा जाता है)—ने जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक करने के लिए पहली बार आधुनिक पश्चिमी भाषण कला के स्थान पर पारंपरिक गणेशोत्सव और शिवाजी महोत्सव जैसे सांस्कृतिक आयोजनों का बड़े पैमाने पर सहारा लिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मुगल काल का वह प्रसिद्ध ग्रंथ "आईन-ए-अकबरी" और "अकबरनामा" के लेखक कौन हैं?
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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्थापित सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों तथा उनके संस्थापकों के वैفكिक और संगठनात्मक स्वरूप के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद और जन्म आधारित जाति व्यवस्था का कड़ा विरोध किया तथा 'वेदों की ओर लौटो' का नारा देते हुए वेदों को अपौरुषेय और ज्ञान का एकमात्र स्रोत माना।
2. स्वामी विवेकानंद द्वारा 1897 में स्थापित 'रामकृष्ण मिशन' ने अद्वैत वेदांत के व्यावहारिक अनुप्रयोग पर बल दिया तथा केवल धार्मिक उद्धार तक सीमित न रहकर समाज सेवा, शिक्षा प्रसार और दरिद्रनारायण की सेवा को ही परम धर्म माना।
3. ज्योतिराव फुले द्वारा वर्ष 1873 में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' का मुख्य उद्देश्य ब्राह्मणवादी वर्चस्व, धार्मिक पाखंडों और रूढ़ियों का खंडन करते हुए शूद्रों और अति-शूद्रों (दलितों) को सामाजिक न्याय व शिक्षा के अधिकार दिलाना था।
4. प्रार्थना समाज की स्थापना आत्माराम पांडुरंग द्वारा वर्ष 1867 में केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से बंबई में की गई थी, जिसका मुख्य ध्यान हिंदू धर्म के भीतर व्याप्त कुरीतियों जैसे बाल विवाह, जाति भेद और मूर्तिपूजा का समर्थन करना तथा हिंदू-मुलाम एकता स्थापित करना था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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