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History of India
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वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. ऋग्वैदिक काल में 'दुहितृ' (Duhitr) शब्द का शाब्दिक अर्थ गाय का दूध दुहने वाली पुत्री से था, और इस काल में सभा और समिति नामक संस्थाओं में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी होती थी, जिन्हें विदथ में भी भाग लेने की अनुमति थी।
  2. 2. उत्तर वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित हो गई और समाज स्पष्ट रूप से चार वर्णों में विभाजित हो गया, तथा शतपथ ब्राह्मण में कृषि से जुड़ी चारों क्रियाओं (जुताई, बुवाई, कटाई और मड़ाई) का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।
  3. 3. ऋग्वेद के दसवें मंडल के 'पुरुष सूक्त' में सर्वप्रथम चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) की उत्पत्ति का उल्लेख विराट पुरुष के विभिन्न अंगों से बताया गया है, जो इस काल के आरंभिक समतावादी समाज के पतन और पदानुक्रमित समाज के उदय का द्योतक है।
  4. 4. वैदिक साहित्य के अंतर्गत आरण्यकों को 'रहस्य पुस्तक' (Mystery Books) कहा जाता है, जिनकी रचना वनों में की गई थी और ये मुख्य रूप से यज्ञों के कर्मकांडीय अनुष्ठानों का विरोध करते हुए केवल भौतिक दर्शन का प्रतिपादन करते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

वैदिक काल भारतीय इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। ऋग्वैदिक समाज मुख्य रूप से कबीलाई और समतावादी था जहाँ महिलाओं को उच्च सम्मान प्राप्त था और 'विदथ', 'सभा' तथा 'समिति' जैसी संस्थाओं में उनकी भागीदारी होती थी। 'दुहितृ' का अर्थ गाय दुहने वाली पुत्री होता था। उत्तर वैदिक काल में अर्थव्यवस्था में लोहे के प्रयोग और कृषि के विस्तार के साथ स्थायित्व आया, जिसका प्रमाण 'शतपथ ब्राह्मण' में मिलता है। ऋग्वेद के दसवें मंडल के 'पुरुष सूक्त' में पहली बार चारों वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। हालाँकि, कथन 4 गलत है क्योंकि आरण्यक वनों में पढ़े जाने के कारण रहस्यमय माने जाते थे, और वे यज्ञों के बाह्य कर्मकांडों के स्थान पर उनके दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थों पर बल देते थे, न कि केवल भौतिक दर्शन का प्रतिपादन करते थे। इस काल के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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