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History of India
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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' और 'आर्य समाज' के संस्थागत व वैचारिक दृष्टिकोण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. ज्योतिराव फुले द्वारा वर्ष 1873 में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व, धार्मिक पाखंड और सामाजिक असमानता को खुली चुनौती देते हुए शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं की बौद्धिक एवं सामाजिक स्वतंत्रता के लिए एक वैकल्पिक धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया।
  2. 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा वर्ष 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने मध्यकालीन पुराणों और मूर्तिपूजा का समर्थन करते हुए वेदों को अपौरुषेय एवं त्रुटिहीन माना, तथा 'वेदों की ओर लौटो' का नारा देकर समाज में शूद्रों और महिलाओं के लिए वेदों के अध्ययन के द्वार बंद कर दिए।
  3. 3. सत्यशोधक समाज ने जहाँ अपनी पत्रिका 'गुलामगिरी' और अन्य माध्यमों से जाति व्यवस्था के क्रूर शोषण का पर्दाफाश किया, वहीं आर्य समाज ने जाति व्यवस्था के जन्म-आधारित स्वरूप का खंडन करते हुए इसे गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर पुनर्गठित करने (वर्ण व्यवस्था) की वकालत की।
  4. 4. आर्य समाज द्वारा प्रारंभ किए गए 'शुद्धि आंदोलन' का मुख्य उद्देश्य उन हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में वापस लाना था जिन्होंने किन्हीं कारणों से इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया था, जबकि सत्यशोधक समाज ने इस प्रकार के धार्मिक पुनरुत्थानवादी अभियानों से पूर्णतः तटस्थ रहते हुए केवल राजनीतिक अधिकारों पर ध्यान केंद्रित किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: ज्योतिराव फुले ने 24 सितंबर 1873 को महाराष्ट्र में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य शूद्रों और अतिशूद्रों को ब्राह्मणवादी पुरोहिती वर्ग के शोषण से मुक्त कराना तथा सामाजिक न्याय स्थापित करना था। कथन 2 गलत है: स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' ने पुराणों, मूर्तिपूजा और बहुदेववाद का कड़ा विरोध किया तथा 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया; इसके साथ ही आर्य समाज ने महिलाओं और शूद्रों के लिए भी वेदों के अध्ययन तथा उपनयन संस्कारों का समर्थन किया, न कि उनके द्वार बंद किए। कथन 3 सही है: सत्यशोधक समाज ने 'गुलामगिरी' जैसी कृतियों के माध्यम से जातिगत उत्पीड़न की कड़ी आलोचना की, और आर्य समाज ने जन्म-आधारित जाति व्यवस्था को खारिज करते हुए वेदों के अनुकूल गुण और कर्म पर आधारित वर्णाश्रम व्यवस्था की वकालत की। कथन 4 गलत है क्योंकि सत्यशोधक समाज ने भी रूढ़िवादी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध कार्य किया और आर्य समाज का 'शुद्धि आंदोलन' धार्मिक के साथ-साथ सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण था। इस काल के सुधार आंदोलनों के बारे में अधिक जानने के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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