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History of India
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प्राचीन भारतीय बौद्ध और जैन धर्म के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. जैन धर्म के 'स्यादवाद' (Syadavada) या 'अनेकांतवाद' के अनुसार, किसी भी वस्तु या सत्य के अनगिनत पहलू होते हैं, और ज्ञान की सापेक्षता को दर्शाने के लिए इसके अंतर्गत 'स्यात्' (शायद) शब्द का प्रयोग किया जाता है।
  2. 2. बौद्ध धर्म के हीनयान संप्रदाय के अंतर्गत 'बोधिसत्व' की अवधारणा को सर्वोच्च महत्व दिया गया है, जिसमें वे प्राणी शामिल हैं जो अपनी मुक्ति से पहले अन्य सभी जीवों के कल्याण और उद्धार के लिए निरंतर साधना करते हैं।
  3. 3. जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य) के पालन के साथ-साथ 'संथारा' (या संलेखना) प्रथा का भी विधान है, जिसके तहत जैन साधक उपवास के माध्यम से अपने प्राण त्यागते हैं।
  4. 4. बौद्ध धर्म की प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में महाकस्सप की अध्यक्षता में आजादशत्रु के शासनकाल में हुआ था, जिसमें बुद्ध के उपदेशों को 'सुत्तपिटक' और 'विनयपिटक' के रूप में संकलित किया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: जैन दर्शन के 'अनेकांतवाद' के सिद्धांत को समझाने के लिए 'स्यादवाद' (या सप्तभंगी नय) का प्रयोग किया जाता है, जिसके अनुसार ज्ञान सापेक्ष होता है और इसके लिए 'स्यात्' शब्द का प्रयोग होता है। कथन 2 गलत है क्योंकि 'बोधिसत्व' की अवधारणा बौद्ध धर्म के **महायान** (Mahayana) संप्रदाय से संबंधित है, हीनयान से नहीं। कथन 3 सही है क्योंकि जैन धर्म में संलेखना या संथारा प्रथा द्वारा प्राण त्यागने का विधान है। कथन 4 गलत है क्योंकि प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन **राजगृह (राजगीर)** में हुआ था, वैशाली में नहीं। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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