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History of India
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महात्मा गांधी के भारत के प्रारंभिक सत्याग्रहों (चंपारण और खेड़ा) तथा असहयोग आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. वर्ष 1917 के चंपारण सत्याग्रह के दौरान राजकुमार शुक्ल के आमंत्रण पर गांधीजी जब चंपारण पहुँचे, तो स्थानीय ब्रिटिश प्रशासन ने उन पर धारा 144 के तहत मुकदमा चलाया, किंतु किसानों के भारी जनसमूह के दबाव के कारण सरकार को आदेश वापस लेना पड़ा और गांधीजी को जाँच समिति का सदस्य बनाया गया।
  2. 2. वर्ष 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में गांधीजी ने किसानों को राजस्व भुगतान पूरी तरह बंद करने का निर्देश तब दिया जब सरकार ने फसल का उत्पादन निर्धारित मानक (सामान्य का एक-चौथाई से कम) से अधिक होने के बावजूद भू-राजस्व में किसी भी प्रकार की छूट देने से स्पष्ट इनकार कर दिया था।
  3. 3. वर्ष 1920 में प्रारंभ हुए असहयोग आंदोलन के दौरान नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने अपनी नीतियों में बड़ा परिवर्तन करते हुए 'शांतिपूर्ण और वैध साधनों' द्वारा 'स्वराज' प्राप्ति के लक्ष्य को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया तथा भाषाई आधार पर प्रागैतिक कांग्रेस कमेटियों के गठन का निर्णय लिया।
  4. 4. चौरी-चौरा कांड (फरवरी 1922) की हिंसक घटना से आहत होकर महात्मा गांधी ने बारडोली में कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक बुलाई, जहाँ आंदोलन को पूरी तरह से समाप्त करने के बजाय केवल सविनय अवज्ञा कार्यक्रमों को स्थगित करने का प्रस्ताव पारित किया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

चंपारण सत्याग्रह (1917) महात्मा गांधी का भारत में पहला सफल सत्याग्रह था, जहाँ राजकुमार शुक्ल के बुलावे पर उन्होंने तीनकठिया प्रणाली के खिलाफ आवाज उठाई। खेड़ा सत्याग्रह (1918) में फसल खराब होने के बावजूद जब ब्रिटिश सरकार ने लगान माफ नहीं किया, तब गांधीजी ने किसानों को लगान न देने का आह्वान किया था। वर्ष 1920 के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन और कांग्रेस संगठन में व्यापक बदलाव किए गए। हालांकि, चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने बारडोली प्रस्ताव के तहत असहयोग आंदोलन को पूरी तरह से वापस ले लिया था, न कि केवल सविनय अवज्ञा को। अधिक जानकारी के लिए देखें विकिपीडिया संदर्भ.
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