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Indian Polity
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भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग की स्थापना एक स्थायी और स्वतंत्र निकाय के रूप में की गई है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर निर्धारित अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं, तथा वर्ष 1993 के बाद से यह एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्य कर रहा है जहाँ सभी आयुक्तों की शक्तियां और वेतन-भत्ते उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान होते हैं।
  2. 2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार लोकसभा या विधानसभा चुनाव के दौरान किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदान की तिथि से ठीक पूर्व 48 घंटों की अवधि (जिसे 'साइलेंट पीरियड' या मौन अवधि कहा जाता है) के दौरान किसी भी प्रकार के सार्वजनिक बैठकों, जुलूसों या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार करने पर पूर्ण प्रतिबंध होता है, और यह अवधि मतदान समाप्त होने के समय तक प्रभावी रहती है।
  3. 3. निर्वाचन आयोग को अपने कार्यों के निर्वहन के लिए लोकसभा या राज्य विधानसभाओं के चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन (Delimitation) करने की अंतिम वैधानिक शक्ति प्राप्त है, और परिसीमन आयोग अधिनियम के तहत इसके द्वारा लिए गए निर्णयों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गई है। 16 अक्टूबर 1993 से यह एक बहु-सदस्यीय निकाय (एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य आयुक्त) बन गया है तथा इनके वेतन और सेवा शर्तें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान होती हैं। कथन 2 सही है क्योंकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के अनुसार मतदान समाप्त होने के ठीक पहले के 48 घंटों की अवधि में चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध रहता है। कथन 3 गलत है क्योंकि निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करने की शक्ति निर्वाचन आयोग को नहीं, बल्कि संसद द्वारा विधि के तहत गठित एक स्वतंत्र 'परिसीमन आयोग' (Delimitation Commission) को प्राप्त होती है। भारतीय राजव्यवस्था के ऐसे ही अन्य महत्वपूर्ण और गहन विषयों को पढ़ने के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर क्लिक करें।
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