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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यकारी और वीटो शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी अनुमति देना या अनुमति रोक लेना या धन विधेयक को छोड़कर किसी अन्य विधेयक को संसद के पुनर्विचार के लिए वापस भेजना का अधिकार है, किंतु यदि संसद उस विधेयक को बिना किसी संशोधन के या संशोधन के साथ पुनः पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को उस पर अनुमति देना अनिवार्य हो जाता है।
  2. 2. राष्ट्रपति की 'आधाकारी वीटो' (Pocket Veto) की शक्ति का आधार यह है कि संविधान में राष्ट्रपति द्वारा किसी विधेयक पर अनुमति देने या न देने के लिए कोई समय-सीमा (Time Limit) निर्धारित नहीं की गई है, जिसके कारण राष्ट्रपति अनिश्चित काल तक विधेयक को अपने पास रख सकते हैं, और इस वीटो शक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम वर्ष 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह द्वारा 'भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक' के संदर्भ में किया गया था।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित (Promulgate) करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति संसद के दोनों सदनों के सत्र में न होने पर ही प्रयोग की जा सकती है, तथा राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश संसद की पुनर्सवेतन बैठक शुरू होने के ठीक छह सप्ताह के भीतर संसद द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य होता है, अन्यथा वह स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है।

Detailed Explanation

उपर्युक्त तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत राष्ट्रपति के पास वीटो शक्तियां निहित हैं, जिसके अंतर्गत वे धन विधेयकों को छोड़कर अन्य विधेयकों को पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं, किंतु संसद द्वारा दोबारा पारित करने पर अनुमति देना बाध्यकारी है। राष्ट्रपति की पॉकेट वीटो (Pocket Veto) की शक्ति का कोई समय-सीमा न होने के कारण उत्पन्न होती है, जिसका प्रयोग ज्ञानी जेल सिंह ने 1986 में किया था। अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश निर्माण की शक्ति भी राष्ट्रपति की एक महत्वपूर्ण विधायी शक्ति है। भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्ययन के लिए इस पोर्टल का संदर्भ लें।
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भारतीय संविधान के भाग-IVक के अंतर्गत समाविष्ट 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) और उनके प्रवर्तन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान में मूल कर्तव्यों को शामिल करने की अनुशंसा स्वर्ण सिंह समिति द्वारा की गई थी, जिसने करों का भुगतान (Payment of Taxes) करने को भी एक मूल कर्तव्य के रूप में जोड़ने की सिफारिश की थी, जिसे तत्कालीन सरकार ने स्वीकार नहीं किया था। 2. अनुच्छेद 51क के तहत प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे तथा उसे अक्षुण्ण रखे, और यह विशिष्ट कर्तव्य संविधान द्वारा केवल भारतीय नागरिकों पर ही नहीं, बल्कि भारत में निवास करने वाले विदेशी नागरिकों पर भी समान रूप से लागू होता है। 3. न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (1999) ने कुछ मूल कर्तव्यों के कानूनी प्रावधानों और उनके कार्यान्वयन से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे, और यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों की प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) है, अर्थात् इनके उल्लंघन पर सीधे उच्चतम न्यायालय से प्रवर्तन कराया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) और उनके न्यायिक पुनरावलोकन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 13 के अंतर्गत 'विधि' (Law) की परिभाषा में संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए अधिनियमों के साथ-साथ अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम और रूढ़ि या प्रथा (Custom or usage) को भी शामिल किया गया है, बशर्ते उनका बल विधि जैसा हो। 2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'गोकक बंधु वाद' या 'केशवानंद भारती वाद' जैसे ऐतिहासिक मामलों में यह प्रतिपादित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किया गया संवैधानिक संशोधन भी अनुच्छेद 13 के अंतर्गत 'विधि' की परिभाषा के दायरे में आता है, जिसके कारण संसद किसी भी मूल अधिकार को संविधान संशोधन के माध्यम से समाप्त या सीमित नहीं कर सकती है। 3. अनुच्छेद 33 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह सशस्त्र बलों, पुलिस बलों, खुफिया संगठनों और दूरसंचार प्रणालियों से जुड़े कर्मियों के मूल अधिकारों पर राष्ट्रीय सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से विधि द्वारा निर्बंधन या प्रतिबंध लगा सकती है, और ऐसे कानूनों को केवल इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वे भाग III का उल्लंघन करते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और भारत में चुनाव सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की होती है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश अनिवार्य होती है। 2. दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने चुनाव सुधारों से संबंधित अपनी रिपोर्ट में सरकारी धन से प्रायोजित विज्ञापनों पर रोक लगाने, चुनाव आचार संहिता के प्रभावी क्रियान्वयन और लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के प्रायोगिक उपयोग की संस्तुति की थी। 3. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 77 के तहत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान किए जाने वाले खर्च की अधिकतम सीमा का निर्धारण निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है, और इस सीमा का उल्लंघन करने पर उम्मीदवार को 6 वर्ष की अवधि के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? नगरपालिका का कार्यकाल कितने वर्ष का होता है? भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायपालिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक अधिकारक्षेत्र के सभी न्यायालयों और अधिकरणों (सैन्य अधिकरणों को छोड़कर) पर अधीक्षण (Superintendence) करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति केवल न्यायिक अधीक्षण तक सीमित है, प्रशासनिक अधीक्षण तक इसका विस्तार नहीं होता है। 2. संविधान के अनुच्छेद 233 के अंतर्गत जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात की जाती है, तथा किसी व्यक्ति को जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए यह अनिवार्य है कि वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता या प्लीडर रहा हो और संघ या राज्य की सेवा में पहले से कार्यरत न हो। 3. संविधान के अनुच्छेद 236 के निर्वचन के अनुसार 'जिला न्यायाधीश' के अंतर्गत नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघु वाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य presidency मजिस्ट्रेट और सेशन न्यायाधीश सभी शामिल होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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