त्वरित लिंक्स
Indian Polity
15 views
ब्रिटिश भारत में संवैधानिक विकास के प्रारंभिक चरणों के अंतर्गत 'पिट्स इंडिया एक्ट, 1784' (Pitt's India Act, 1784) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. इस अधिनियम द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पहली बार पृथक किया गया, तथा राजनीतिक मामलों के अधीक्षण और नियंत्रण के लिए ब्रिटिश मंत्रिमंडल के छह सदस्यों वाले एक नए निकाय 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) की स्थापना की गई, जिससे ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के नागरिक, सैन्य और राजस्व संबंधी सभी मामलों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त हो गया।
- 2. गवर्नर-जनरल की परिषद के सदस्यों की संख्या जो 'रेगुलेटिंग एक्ट, 1773' के तहत चार निर्धारित की गई थी, उसे पिट्स इंडिया एक्ट के माध्यम से घटाकर तीन कर दिया गया, ताकि गवर्नर-जनरल को निर्णय लेने में विशेष परिस्थितियों में निर्णायक मत (Casting Vote) के माध्यम से अधिक प्रशासनिक सुगमता और स्थायित्व मिल सके।
- 3. इस अधिनियम के माध्यम से भारत में पहली बार द्वैध शासन प्रणाली (System of Dual Government) की औपचारिक शुरुआत हुई, जिसके तहत कंपनी के व्यावसायिक मामलों का प्रबंधन 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' (Court of Directors) के हाथों में छोड़ दिया गया, जबकि राजनीतिक मामलों का प्रबंधन 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' के अधीन कर दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए सभी कथन पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 (Pitt's India Act, 1784) के संदर्भ में पूरी तरह सही हैं। पिट्स इंडिया एक्ट ने रेगुलेटिंग एक्ट 1773 की कमियों को दूर करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के वाणिज्यिक और राजनीतिक कार्यों को अलग-अलग कर दिया। इसके तहत नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) की स्थापना की गई जो ब्रिटिश मंत्रिमंडल के नियंत्रण में था, और निदेशक मंडल (Court of Directors) को व्यापारिक मामलों का जिम्मा सौंपा गया, जिससे द्वैध शासन की शुरुआत हुई। साथ ही, गवर्नर-जनरल की परिषद के सदस्यों की संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई ताकि निर्णय प्रक्रिया तेज हो सके। भारतीय संविधान के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में अधिक विस्तार से पढ़ने के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के इस विस्तृत पोर्टल का अध्ययन कर सकते हैं।
Related Questions
→
भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) और उनसे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) भारत के सभी नागरिकों को कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार देता है, किंतु राज्य को इस अधिकार पर 'व्यापक लोक हित' (General Public Interest) में युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने तथा किसी व्यापार या कारोबार के पूर्णतः या भागतः राज्य द्वारा राजकीय स्वामित्व (State Monopoly) स्थापित करने के लिए कानून बनाने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है।
2. अनुच्छेद 21 के अंतर्गत दिए गए 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण' के दायरे में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है, और यह अधिकार पूर्ण एवं असीमित है, जिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा या लोक व्यवस्था के आधार पर भी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है।
3. अनुच्छेद 32 के तहत 'संवैधानिक उपचारों का अधिकार' स्वयं में एक मूल अधिकार है, जिसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और संसद विधि द्वारा किसी अन्य न्यायालय को भी अपनी स्थानीय अधिकारिता के भीतर इन रिटों को जारी करने की शक्ति प्रदान कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) के गठन का प्रावधान किया गया है, और इसकी स्थापना सर्वप्रथम किस वर्ष की गई थी?
→
भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत नियुक्त महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई (Audience) का अधिकार प्राप्त है, किंतु उसे संसद के किसी भी सदन में या उसकी संयुक्त बैठक में मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
2. भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) न केवल केंद्र और राज्य सरकारों के लेखों की संपरीक्षा (Audit) करता है, बल्कि उसे भारत की संचित निधि से धन निकालने पर पूर्व-नियंत्रण (Pre-audit) का भी पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य पद या नियोजन का पात्र नहीं होता है, जबकि महान्यायवादी के लिए ऐसा कोई विधिक प्रतिबंध नहीं है कि वह अपनी निजी प्रैक्टिस या वकालत नहीं कर सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन की जाती है, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया तथा उसके सेवा शर्तें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान होती हैं, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना नहीं हटाया जा सकता है।
2. 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023' के प्रावधानों के अनुसार निर्वाचन आयोग के चयन के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदान समाप्त होने के लिए नियत समय के साथ समाप्त होने वाले 48 घंटों की अवधि के दौरान किसी भी जनसभा, जुलूस या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार करने पर पूर्ण प्रतिबंध होता है।
4. निर्वाचन आयोग द्वारा वर्ष 2018 में शुरू की गई 'cVIGIL' ऐप का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों द्वारा आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के उल्लंघन और चुनावी कदाचार की घटनाओं की लाइव डिजिटल तस्वीरें या वीडियो आधारित शिकायतें दर्ज कराने की सुविधा प्रदान करना है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने की शक्ति किस अनुच्छेद में वर्णित है?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.