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Indian Polity
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरित होकर ग्रहण किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के आदर्श फ्रांस की क्रांति (1789) से लिए गए हैं।
- 2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में दिए गए निर्णय के अनुसार प्रस्तावना को संविधान का एक अभिन्न अंग माना गया था, जिसे बाद में 'केशवानंद भारती वाद' (1973) में पलट दिया गया।
- 3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए, जिनमें से 'अखंडता' शब्द प्रस्तावना के मूल पाठ में पहले से मौजूद था, इसलिए इसे केवल दूसरे पैराग्राफ में स्थानांतरित किया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय' के आदर्श को 1917 की रूसी क्रांति से लिया गया है, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के आदर्श 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि प्रस्तावना संविधान का अंग **नहीं** है। इसके विपरीत, 'केशवानंद भारती वाद' (1973) और 'एलआईसी ऑफ़ इंडिया वाद' (1995) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है। कथन 3 गलत है क्योंकि 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' (धर्मनिरपेक्ष) और 'अखंडता' तीनों ही नए शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा पहली बार प्रस्तावना में जोड़े गए थे; 'अखंडता' शब्द पहले से मौजूद नहीं था। भारतीय राजनीति और संविधान के ऐसे ही अन्य महत्वपूर्ण विषयों का गहन अध्ययन करने के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर जा सकते हैं।
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ऊर्जा के प्रवाह का "10 प्रतिशत नियम" किसने दिया था?
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 315 के अनुसार संघ के लिए एक संघ लोक सेवा आयोग और प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्य लोक सेवा आयोग होगा, किंतु दो या अधिक राज्य यह करार कर सकते हैं कि लोक सेवा आयोग उन राज्यों के ऐसे समूहों की आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा और राष्ट्रपति के अनुरोध पर ऐसा आयोग उन राज्यों के लिए भी कार्य कर सकता है।
2. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, किंतु राज्यपाल को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह कदाचार के आधार पर राज्य आयोग के किसी सदस्य को सीधे अपने विवेक से पदच्युत कर सकता है।
3. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य अपने पद की अवधि (6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो) समाप्त होने के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य कार्यालय या लाभ के पद के पात्र नहीं होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष अपने कार्यकाल की समाप्ति के पश्चात संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति का पात्र होता है।
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' को लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे पुनःस्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक होती है, किंतु राज्यसभा इस विधेयक को पारित करने, अस्वीकृत करने या इसमें संशोधन करने (अनुच्छेद 109 की प्रक्रिया के अधीन रहते हुए) की सामान्य विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकती है।
2. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' (जिसमें ऐसा उपबंध है जिससे Consolidated Fund of India से व्यय करना पड़े) को संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन को उस विधेयक पर विचार करने की संस्तुति न कर दी हो।
3. लोकसभा और राज्यसभा के बीच गतिरोध को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान धन विधेयकों (Money Bills) और संविधान संशोधन विधेयकों के अतिरिक्त साधारण विधियों और वित्तीय विधेयकों—दोनों श्रेणियों—के मामलों में लागू होता है।
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भारतीय संविधान के आपातकालीन उपबंधों और उनसे संबंधित विभिन्न संवैधानिक संशोधनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 38वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह उपबंध किया गया था कि राष्ट्रपति द्वारा विभिन्न आधारों पर एक साथ कई राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणाएँ की जा सकती हैं और राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा समाप्त कर दिया गया।
2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के माध्यम से यह अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा या उसके अनुमोदन का प्रस्ताव संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत (विशेष बहुमत) द्वारा ही पारित किया जाना चाहिए।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 द्वारा दिए गए मूल अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं, किंतु आपातकाल की समाप्ति के पश्चात केवल वे ही विधियाँ पुनर्जीवित होती हैं जो आपातकाल के दौरान बनाई गई थीं, जबकि आपातकाल से पहले की विधियों को स्वतः संरक्षण प्राप्त नहीं होता है।
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के क्रम में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु पारित अधिनियमों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, तथा इसी अधिनियम के प्रावधान के अंतर्गत वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों के बीच अंतर किया गया तथा राजनीतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) की स्थापना की गई, जिसे ब्रिटिश मंत्रिमंडल के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया।
3. चार्टर अधिनियम, 1833 द्वारा बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बना दिया गया और देश की वित्तीय तथा विधाई शक्तियों का पूर्ण केंद्रीकरण करते हुए बंबई तथा मद्रास के गवर्नरों की विधाई शक्तियों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया।
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