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Indian Polity
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और राज्यसभा की विशिष्ट शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 249 के अंतर्गत राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से उपस्थित संकल्प पारित कर संसद को राज्य सूची (State List) के किसी विषय पर राष्ट्रीय हित में कानून बनाने के लिए अधिकृत कर सकती है, और ऐसा प्रस्ताव अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए वैध रहता है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 312 के तहत राज्यसभा को यह अनन्य (Exclusive) शक्ति प्राप्त है कि वह उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत से संकल्प पारित कर नई अखिल भारतीय सेवा (All India Services) के सृजन का अधिकार केंद्र सरकार को दे सकती है।
  3. 3. लोकसभा द्वारा पारित किसी साधारण विधेयक (Ordinary Bill) को जब राज्यसभा में भेजा जाता है, और यदि राज्यसभा उसे अस्वीकार कर देती है या ऐसे संशोधनों को प्रस्तुत करती है जिनसे लोकसभा असहमत है, तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 108 के तहत बुलाई जाने वाली संयुक्त बैठक (Joint Sitting) में निर्णय कुल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से लिया जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 249 के तहत राज्यसभा द्वारा पारित राज्य सूची के विषय से संबंधित प्रस्ताव एक बार में अधिकतम एक वर्ष के लिए नहीं, बल्कि **एक वर्ष** के लिए वैध होता है, किंतु इसे बार-बार बढ़ाया जा सकता है और प्रत्येक बार यह एक वर्ष से अधिक नहीं बढ़ सकता। कथन 2 बिल्कुल सही है; अनुच्छेद 312 के तहत नई अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन का अनन्य अधिकार राज्यसभा के पास है। कथन 3 सही है; संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108) में गतिरोध समाप्त करने के लिए दोनों सदनों के संयुक्त सत्र में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से निर्णय लिया जाता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान सभा के गठन और इसकी निर्माण प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान सभा के सदस्यों का चयन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के माध्यम से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर किया गया था, जिसमें ब्रिटिश प्रांतों के साथ-साथ देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को भी मनोनीत किया गया था। 2. 'माउंटबेटन योजना' (3 जून 1947) के तहत भारत के विभाजन के पश्चात संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या को घटाकर 299 कर दिया गया था, जिसमें से ब्रिटिश भारत के लिए 229 और देशी रियाسतों के लिए 70 प्रतिनिधि निर्धारित किए गए थे। 3. संविधान सभा की कुल महिला सदस्यों की संख्या 15 थी, जिनमें से 'दक्षयानी वेलायुडन' एकमात्र ऐसी महिला सदस्य थीं जो अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) वर्ग से संबंधित थीं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान की प्रस्तावना में अब तक केवल एक ही बार वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संशोधन किया गया है, जिसके माध्यम से इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए थे। 2. 'बेरुबारी यूनियन वाद' (1960) में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है, जबकि 'केशवानंद भारती वाद' (1973) में इस निर्णय को पलटते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है। 3. प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्तियों का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तथा इसकी प्रकृति गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को देश के न्यायालयों में कानूनी रूप से लागू नहीं कराया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत और संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को स्वीकृत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) ही परिवर्धित रूप से भारतीय संविधान की प्रस्तावना बना, जिसमें प्रस्तावना को संविधान के एक विशिष्ट भाग के रूप में स्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में यह प्रतिपादित किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है। 2. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरित होकर लिया गया है, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' (Liberty, Equality and Fraternity) के आदर्शों को फ्रांस की क्रांति (1789) के प्रेरणास्त्रोत से अपनाया गया है। 3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार संशोधन किया गया है, जिसके माध्यम से इसमें 'समाजवादी' (Socialist), 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) और 'अखंडता' (Integrity) शब्दों को जोड़ा गया, और इन संशोधनों की वैधानिकता को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद' (1973) के उस सिद्धांत के आलोक में वैध ठहराया गया जिसके तहत प्रस्तावना को संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure) माना गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की कार्यकारी, विधायी, न्यायिक और क्षдан (Pardoning) शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति की यह क्षमादान शक्ति एक कार्यपालिका शक्ति है, जिसमें मृत्युदंड के मामलों में राज्यपाल के पास भी समानांतर रूप से क्षमादान देने की पूर्ण संवैधानिक शक्ति होती है। 2. राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत प्रख्यापित अध्यादेश की शक्ति संसद की विधि बनाने की शक्ति के समान ही व्यापक होती है, किंतु यह अध्यादेश संसद के पुनरारंभ होने के छह सप्ताह के भीतर संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य होता है, और राष्ट्रपति अपनी इस अध्यादेश निर्माण की शक्ति का प्रयोग तब भी कर सकता है जब संसद के दोनों सत्र में न हों। 3. राष्ट्रपति की संघ की कार्यपालिका शक्ति अनुच्छेद 53 के अनुसार उसमें निहित होती है, जिसके अंतर्गत वह संघ के सभी महत्वपूर्ण अधिकारियों जैसे प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों, महान्यायवादी, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG), और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करता है, तथा संघ के रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश (Supreme Command) भी राष्ट्रपति में ही निहित होता है, जिसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्तियों (Pardoning Powers) और अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालय (Court-martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में भी क्षमादान, प्रविलंबन या परिहार करने की अनन्य शक्ति प्राप्त है, और इस शक्ति का प्रयोग करते समय राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिए बाध्य होना पड़ता है, भले ही न्यायिक समीक्षा के दायरे में यह शक्ति आती हो। 2. राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत जारी किया गया अध्यादेश केवल तभी वैध माना जाता है जब संसद के दोनों सत्रों में से कोई एक सत्र सत्रवसान में हो, और राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग अपने स्वविवेक से कर सकता है, जिसके लिए मंत्रिपरिषद की लिखित सलाह की कोई आवश्यकता नहीं होती है। 3. अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) में 'क्षमा' (Pardon) से लेकर 'लघुकरण' (Commutation), 'परिहार' (Remission), 'विराम' (Reprieve) और 'प्रविलंबन' (Respite) शामिल हैं, तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार राष्ट्रपति की इन शक्तियों का प्रयोग बिना किसी मनमानेपन के किया जाना चाहिए क्योंकि यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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