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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकारों और विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का मूल अधिकार प्रदत्त किया गया है, किंतु राज्य इस अधिकार के प्रयोग पर 'व्यापक लोक हित' (General Public Interest) में युक्तियुक्त निर्बंधन आरोपित कर सकता है, और इसके तहत राज्य किसी भी व्यापार या कारोबार पर पूर्ण एकाधिकार (Complete Monopoly) स्थापित करने के लिए भी कानून बना सकता है, जिसके लिए नागरिकों के अपने व्यवसाय के संवैधानिक अधिकार का पूर्णतः समाप्त होना असंवैधानिक नहीं माना जाएगा।
- 2. 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत दिए गए 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण' के अधिकार के दायरे में 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) को उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा 'के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' मामले में सर्वसम्मति से एक मौलिक अधिकार घोषित किया गया था, जो अनुच्छेद 21 के साथ-साथ भाग-III के अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत भी अंतर्निहित है।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 22 के उपबंधों के अनुसार निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के अधीन किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह विदेशी हो या भारत का नागरिक, किसी भी परिस्थिति में बिना सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की राय प्राप्त किए तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, और संसद के पास यह शक्ति नहीं है कि वह इस तीन महीने की अवधि को बिना बोर्ड की संस्तुति के बढ़ा सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत नागरिकों को कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार है, किंतु अनुच्छेद 19(6) के अनुसार राज्य इस पर 'व्यापक लोक हित' में युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न मामलों (जैसे 'ओरिजिन एंड डेवलपमेंट केस') में यह स्पष्ट किया है कि राज्य लोक हित में किसी व्यापार, व्यवसाय या उद्योग को अपने हाथ में ले सकता है और नागरिकों के लिए पूर्ण या आंशिक एकाधिकार (Monopoly) स्थापित कर सकता है।
कथन 2 सही है: 'के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' के ऐतिहासिक सर्वसम्मत निर्णय में उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि 'निजता का अधिकार' संविधान के अनुच्छेद 21 तथा भाग-III द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता और गरिमा का एक अभिन्न और अंतर्निहित हिस्सा है।
कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 22(4) के तहत निवारक नजरबंदी के मामले में किसी व्यक्ति को सामान्यतः 3 महीने से अधिक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, जब तक कि सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) निर्धारित अवधि के भीतर विस्तार की संस्तुति न दे। किंतु, संसद को यह संवैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा किसी व्यक्ति को सलाहकार बोर्ड की राय के बिना भी 3 महीने से अधिक की अवधि के लिए निवारक नजरबंदी के अधीन रखे जाने के लिए अधिकृत कर सकती है (विशेषकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में)। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था को पढ़ें।
कथन 2 सही है: 'के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' के ऐतिहासिक सर्वसम्मत निर्णय में उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि 'निजता का अधिकार' संविधान के अनुच्छेद 21 तथा भाग-III द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता और गरिमा का एक अभिन्न और अंतर्निहित हिस्सा है।
कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 22(4) के तहत निवारक नजरबंदी के मामले में किसी व्यक्ति को सामान्यतः 3 महीने से अधिक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, जब तक कि सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) निर्धारित अवधि के भीतर विस्तार की संस्तुति न दे। किंतु, संसद को यह संवैधानिक शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा किसी व्यक्ति को सलाहकार बोर्ड की राय के बिना भी 3 महीने से अधिक की अवधि के लिए निवारक नजरबंदी के अधीन रखे जाने के लिए अधिकृत कर सकती है (विशेषकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में)। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था को पढ़ें।
Related Questions
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लोकसभा स्पीकर इस्तीफा किसे देते हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' को लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे पुनःस्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति आवश्यक होती है, किंतु राज्यसभा इस विधेयक को पारित करने, अस्वीकृत करने या इसमें संशोधन करने (धन विधेयकों की तरह प्रतिबंधों के अधीन रहते हुए) की सामान्य विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकती है।
2. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' (जिसमें ऐसा उपबंध है जिससे भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़े) को संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन को उस विधेयक पर विचार करने की संस्तुति न कर दी हो।
3. लोकसभा और राज्यसभा के बीच विधाई गतिरोध को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान धन विधेयकों और संविधान संशोधन विधेयकों के अतिरिक्त 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' के मामलों में लागू होता है, किंतु 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' के मामलों में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल (विधानसभा और विधान परिषद) के गठन, संरचना और उनकी विधाई शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन या उसका उत्साहक (Abolition) कर सकती है, बशर्ते संबंधित राज्य की विधानसभा कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का संकल्प पारित करे, और इस प्रकार पारित संकल्प के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति अनिवार्य होती है।
2. विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु किसी भी स्थिति में इसकी कुल संख्या 40 से कम नहीं होनी चाहिए (अपवादस्वरूप जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम से पूर्व इसकी संख्या भिन्न थी)।
3. विधान परिषद के कुल सदस्यों का एक-तिहाई भाग स्थानीय निकायों (जैसे नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों आदि) के निर्वाचक मंडल द्वारा चुना जाता है, तथा एक-बारहवां भाग उन स्नातकों द्वारा चुना जाता है जो उस राज्य में कम से कम तीन वर्ष से निवास कर रहे हों या उस राज्य के क्षेत्र में स्थित किसी विश्वविद्यालय से कम से कम तीन वर्ष पूर्व स्नातक की डिग्री प्राप्त कर चुके हों।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और नागरिकता अधिनियम, 1955 के विधिक स्वरूप के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 7 यह प्रावधान करता है कि जो व्यक्ति 1 मार्च 1947 के पश्चात भारत से पाकिस्तान के राजक्षेत्र के लिए प्र्रव्रज्या (Migration) कर गया है, वह भारत का नागरिक नहीं समझा जाएगा, किंतु इसके अंतर्गत यह अपवाद भी शामिल है कि यदि ऐसा व्यक्ति पुनर्वास के स्थायी अनुज्ञापत्र या भारत लौटने के कानूनी परमिट के आधार पर भारत वापस लौट आता है, तो वह अनुच्छेद 6 के प्रयोजनों के लिए भारत को प्र्रव्रज्या करने वाला व्यक्ति माना जाएगा।
2. नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6 के तहत 'देशीकरण द्वारा' (By Naturalization) नागरिकता प्राप्त करने हेतु यह एक अनिवार्य शर्त है कि आवेदक को आवेदन देने से ठीक पहले के 12 महीनों की अवधि के दौरान भारत में लगातार निवास करना होगा, तथा उससे ठीक पहले के 14 वर्षों में से कम से कम 11 वर्षों तक भारत में निवास करना या सरकारी सेवा में रहना आवश्यक होता है।
3. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अंतर्गत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को दी गई नागरिकता संबंधी छूट और 'अवैध प्रवासी' की परिभाषा से मुक्ति का यह विशेष उपबंध संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के अंतर्गत आने वाले असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों तथा 'इनर लाइन परमिट' (ILP) प्रणाली वाले राज्यों पर लागू नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में पारित 'रेगुलेटिंग एक्ट, 1773' और 'पिट्स इंडिया एक्ट, 1784' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया तथा उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, जिसके निर्णय बहुमत से होते थे और गवर्नर-जनरल को केवल बराबरी की स्थिति में निर्णायक मत (casting vote) देने का अधिकार था।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक मामलों पर नियंत्रण और अधिक बढ़ा दिया गया, जिसके तहत 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (नियंत्रण बोर्ड) की स्थापना की गई जो राजनीतिक मामलों की देखरेख करता था, जबकि 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर' (निदेशक मंडल) को व्यापारिक मामलों के संचालन की अनुमति दी गई।
3. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के प्रावधानों के अंतर्गत ही वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई, जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश शामिल थे, तथा इस न्यायालय को भारत के सभी प्रांतों के दीवानी और फौजदारी मामलों में सर्वोच्च अपीलीय अधिकार प्राप्त था।
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