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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता, अधीनस्थ न्यायपालिका तथा उनसे जुड़े विभिन्न संवैधानिक उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 228 के अनुसार यदि किसी उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि उसके अधीनस्थ किसी न्यायालय में लंबित किसी मामले में संविधान के निर्वचन से संबंधित कोई महत्वपूर्ण विधि का प्रश्न अंतर्ग्रस्त है, तो वह उस मामले को अपने पास मंगा सकता है और या तो स्वयं ही उस मामले का निपटारा कर सकता है या फिर विधि के उस प्रश्न का निर्धारण करके उस मामले को वापस उसी न्यायालय को निर्देश के साथ लौटा सकता है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 234 के तहत जिला न्यायाधीशों से भिन्न न्यायिक सेवा के अन्य व्यक्तियों की नियुक्ति, राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श करके बनाए गए नियमों के अनुसार की जाती है, जबकि जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा सीधे अपने स्वविवेक से की जाती है, जिसमें उच्च न्यायालय से परामर्श करना अनिवार्य नहीं होता है।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 237 के अनुसार राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकता है कि इस अध्याय (अधीनस्थ न्यायालयों से संबंधित) के उपबंध, जो मजिस्ट्रेटों के किसी वर्ग पर लागू होते हैं, राज्य के किसी भी न्यायिक सेवा के अधिकारियों पर लागू नहीं होंगे, और यह शक्ति पूरी तरह से राज्य के मंत्रिमंडल के नियंत्रण में होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 228 के तहत उच्च न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि अधीनस्थ न्यायालय में कोई ऐसा मामला लंबित है जिसमें संविधान के निर्वचन से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल है, तो वह उसे अपने पास मंगा सकता है। कथन 2 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 233 के अनुसार जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति राज्यपाल द्वारा संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात ही की जाती है, न कि राज्यपाल द्वारा अपने स्वविवेक से। कथन 3 भी असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 237 के अंतर्गत राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकता है कि इस अध्याय के उपबंध मजिस्ट्रेटों के किसी वर्ग पर राज्य के न्यायिक सेवा से भिन्न या संबंधित अधिकारियों पर लागू होंगे, और इसके लिए भी उच्च न्यायालय से परामर्श करना आवश्यक होता है। विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
Related Questions
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चार्टर अधिनियम, 1853 (Charter Act of 1853) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी और प्रशासनिक कार्यों को पहली बार स्पष्ट रूप से अलग किया गया, तथा परिषद में छह नए पार्षदों को जोड़ा गया जिन्हें 'विधान पार्षद' (Legislative Councillors) कहा गया।
2. इस अधिनियम के तहत पहली बार भारतीय केंद्रीय विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व की शुरुआत की गई, जिसके अंतर्गत मद्रास, बॉम्बे, बंगाल और आगरा की स्थानीय सरकारों द्वारा चार नए सदस्यों का चयन किया गया।
3. इस अधिनियम ने सिविल सेवकों की भर्ती और चयन के लिए खुली प्रतियोगिता प्रणाली का शुभारंभ किया, जिसके लिए वर्ष 1854 में 'मैकाले समिति' की नियुक्ति की गई और यह व्यवस्था कंपनी के निदेशक मंडल (Court of Directors) के राजनीतिक प्रभाव के अंतर्गत रखी गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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चार्टर अधिनियम, 1853 (Charter Act of 1853) के प्रावधानों और भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के तहत पहली बार गवर्नर-जनरल की परिषद के विधाई और प्रशासनिक कार्यों को पृथक् किया गया, जिसके अंतर्गत परिषद में छह नए पार्षद जोड़े गए जिन्हें विधान पार्षद (Legislative Councillors) कहा गया, और इस प्रकार केंद्रीय विधान परिषद को एक 'लघु संसद' (Mini-Parliament) के रूप में स्थापित किया गया।
2. चार्टर अधिनियम, 1853 ने सिविल सेवकों के चयन और भर्ती के लिए खुली प्रतियोगिता प्रणाली का शुभारंभ किया, और इसके तहत वर्ष 1854 में 'मैकाले समिति' (Macaulay Committee) की नियुक्ति की गई जो भारतीय सिविल सेवा से संबंधित थी।
3. इस अधिनियम के माध्यम से कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पहली बार पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया और ब्रिटिश क्राउन को सीधे भारत पर शासन करने का पूर्ण अधिकार प्रदान करते हुए 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' और 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टऱ्स' को भंग कर दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत नियुक्त महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई (Audience) का अधिकार प्राप्त है, किंतु उसे संसद के किसी भी सदन में या उसकी संयुक्त बैठक में मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
2. भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) न केवल केंद्र और राज्य सरकारों के लेखों की संपरीक्षा (Audit) करता है, बल्कि उसे भारत की संचित निधि से धन निकालने पर पूर्व-नियंत्रण (Pre-audit) का भी पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य पद या नियोजन का पात्र नहीं होता है, जबकि महान्यायवादी के लिए ऐसा कोई विधिक प्रतिबंध नहीं है कि वह अपनी निजी प्रैक्टिस या वकालत नहीं कर सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत प्रदत्त नागरिकता के प्रावधानों तथा संसद की विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार, यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो वह स्वतः अनुच्छेद 5, 8 और 10 के उपबंधों के तहत भारत का नागरिक नहीं रह जाएगा, और यह नियम युद्धकाल या शांति Vakal किसी भी परिस्थिति में समान रूप से लागू होता है।
2. अनुच्छेद 11 संसद को यह पूर्ण और अनन्य शक्ति प्रदान करता है कि वह नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में कोई भी उपबंध कर सकेगी, और संसद द्वारा इसी शक्ति के तहत 'नागरिकता अधिनियम, 1955' पारित किया गया था जिसमें विदेशी नागरिकों के लिए पंजीकरण या देशीकरण के माध्यम से नागरिकता प्राप्ति के विस्तृत नियम बनाए गए हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 10 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति, जो इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में से किसी के अधीन भारत का नागरिक है या समझा जाता है, संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए ऐसी नागरिकता का निरंतर धारक बना रहेगा, जिसका अर्थ यह है कि संसद नागरिकता के नियम तो बदल सकती है किंतु किसी वैध नागरिक को भूतलक्षी प्रभाव (Retrospective effect) से सीधे नागरिकताविहीन घोषित करने का अंधाधुंध अधिकार रखती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 और शहरी स्थानीय शासन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़े गए अनुच्छेद 243-W के अंतर्गत राज्यों की विधायिकाओं को यह शक्ति दी गई है कि वे नगरपालिकाओं को ऐसे शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान कर सकती हैं जो बारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध 29 विषयों से संबंधित आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ तैयार करने और उनके कार्यान्वयन के लिए आवश्यक हों।
2. इस अधिनियम के तहत प्रत्येक नगरपालिका के लिए पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल निर्धारित किया गया है, और यदि किसी नगरपालिका को समय से पूर्व विघटित कर दिया जाता है, तो विघटन की तिथि से छह महीने की अवधि के भीतर नई नगरपालिका के गठन के लिए चुनाव संपन्न करा लिया जाना अनिवार्य है, बशर्ते विघटित नगरपालिका का शेष कार्यकाल छह महीने से कम का हो।
3. अनुच्छेद 243-ZE के प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक राज्य में महानगर स्तर पर 'महानगर योजना समिति' (Metropolitan Planning Committee) का गठन किया जाएगा, और इस समिति के कुल सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3rd) सदस्य उस महानगर क्षेत्र में स्थित नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों और पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा अपने में से ही चुने जाएंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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