BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
15 views

भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के सदनों (विधानसभा और विधान परिषद) की संरचना, गठन तथा उनकी विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन या उसका उत्सादन (Abolition) कर सकती है, यदि संबंधित राज्य की विधानसभा कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का संकल्प पारित कर दे, और इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 171 के अंतर्गत किसी राज्य की विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु किसी भी स्थिति में विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या 40 से कम नहीं होनी चाहिए, हालांकि अपवादस्वरूप जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम से पहले वहाँ इसके कम सदस्य भी रहे थे।
  3. 3. विधान परिषद के कुल सदस्यों में से एक-तिहाई सदस्यों का निर्वाचन स्थानीय निकायों (जैसे- नगरपालिका, जिला बोर्ड) के निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है, एक-तिहाई सदस्यों का निर्वाचन विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने से भिन्न व्यक्तियों में से किया जाता है, और एक-बारहवें सदस्यों का निर्वाचन ऐसे स्नातकों (Graduates) द्वारा किया जाता है जो कम से कम तीन वर्ष पूर्व उस राज्य के क्षेत्र के भीतर किसी विश्वविद्यालय से स्नातक हो चुके हों।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए विधि बना सकती है यदि राज्य विधानसभा ऐसा संकल्प विशेष बहुमत से पारित करे। अनुच्छेद 169(4) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि इस प्रकार का कोई भी विधि निर्माण अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 171(1) के अनुसार विधान परिषद की कुल संख्या विधानसभा की कुल संख्या की 1/3 से अधिक नहीं होगी और किसी भी दशा में 40 से कम नहीं होगी (अपवाद को छोड़कर)। कथन 3 गलत है क्योंकि विधान परिषद के निर्वाचन में 1/3 सदस्य स्थानीय निकायों द्वारा, 1/3 सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा, 1/12 सदस्य स्नातकों द्वारा, 1/12 सदस्य शिक्षकों द्वारा (कम से कम 3 वर्ष से शिक्षण कार्य कर रहे), और शेष 1/6 सदस्यों का मनोनयन राज्यपाल द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों में से किया जाता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
Share:

Related Questions

भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 43 के अंतर्गत राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से, कृषि उद्योग या अन्य प्रकार के सभी श्रमिकों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर और अवकाश के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा, तथा इसी उद्देश्य के तहत संविधान में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 'उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी' से संबंधित अनुच्छेद 43A को भी जोड़ा गया था। 2. संविधान के अनुच्छेद 48A (पर्यावरण, वन और वन्य जीवों की रक्षा) और अनुच्छेद 48 (कृषि और पशुपालन का संगठन) दोनों को मूल संविधान में 1950 के समय ही शामिल कर लिया गया था, और इनमें से किसी भी अनुच्छेद में बाद में संविधान संशोधनों के माध्यम से कोई संशोधन या नया प्रावधान नहीं जोड़ा गया है। 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद (1973)' और 'मिनर्वा मिल्स वाद (1980)' में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे एक रथ के दो पहियों के समान हैं जो देश में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत और संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को स्वीकृत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) ही परिवर्धित रूप से भारतीय संविधान की प्रस्तावना बना, जिसमें प्रस्तावना को संविधान के एक विशिष्ट भाग के रूप में स्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में यह प्रतिपादित किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है। 2. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरित होकर लिया गया है, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' (Liberty, Equality and Fraternity) के आदर्शों को फ्रांस की क्रांति (1789) के प्रेरणास्त्रोत से अपनाया गया है। 3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार संशोधन किया गया है, जिसके माध्यम से इसमें 'समाजवादी' (Socialist), 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) और 'अखंडता' (Integrity) शब्दों को जोड़ा गया, और इन संशोधनों की वैधानिकता को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद' (1973) के उस सिद्धांत के आलोक में वैध ठहराया गया जिसके तहत प्रस्तावना को संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure) माना गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके विभिन्न संशोधनों तथा न्यायिक प्रवृत्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए निदेशक तत्व जोड़े गए, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39(f)), समान न्याय और गरीबों को निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करना (अनुच्छेद 39A), उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43A), तथा पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा (अनुच्छेद 48A) प्रमुख रूप से शामिल हैं। 2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 38 में एक नया खंड (2) जोड़ा गया, जिसके तहत राज्य को विशेष रूप से यह निर्देश दिया गया कि वह आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को केवल व्यक्तियों के बीच ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए समूहों के बीच भी कम से कम करने का प्रयास करेगा। 3. 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 43B को अंतःस्थापित किया गया, जिसके माध्यम से राज्य को सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोक लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करने का संवैधानिक निर्देश दिया गया है। 4. नीति निर्देशक तत्वों को देश के शासन में मूलभूत माना गया है (अनुच्छेद 37), और यदि राज्य विधानसभा या संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून को चुनौती दी जाती है कि वह किसी नीति निर्देशक तत्व को प्रभावी करने के उद्देश्य से बनाया गया है और इसलिए वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय ने 'केशवानंद भारती वाद' (1973) से पूर्व 'गोलकनाथ वाद' में यह निर्णय दिया था कि नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत का संविधान 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) है, यह किसने कहा था? संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, तथा दोनों ही आयोगों के मामले में यह संवैधानिक अनिवार्यता है कि आयोग के आधे सदस्यों के पास केंद्र या राज्य सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष का प्रशासनिक सेवा का अनुभव होना अनिवार्य है। 2. संविधान के अनुच्छेद 317 के प्रावधानों के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को केवल राष्ट्रपति के आदेश से ही उसके पद से हटाया जा सकता है, भले ही वह राज्य लोक सेवा आयोग का सदस्य क्यों न हो, और राष्ट्रपति ऐसा तब कर सकता है जब उच्चतम न्यायालय द्वारा (अनुच्छेद 145 के तहत राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित जांच के पश्चात) दुराचार (Misbehaviour) के आधार पर उसे हटाए जाने की संस्तुति दी गई हो। 3. संविधान के अनुच्छेद 322 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के व्यय, जिसमें आयोग के सदस्यों या कर्मचारियों को या उनके संबंध में देय कोई वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित (Charged) होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के व्यय संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.