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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power - अनुच्छेद 72) और उसकी न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को ऐसे मामलों में जिनमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी विधि के विरुद्ध दिया गया है जिस तक संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार होता है, क्षमा, प्ररिलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) की तुलना में अधिक व्यापक है क्योंकि इसमें मृत्युदंड के मामलों में संपूर्ण क्षमा (Pardon) और कोर्ट-मार्शल (सैन्य न्यायालय) द्वारा दिए गए दंड के मामले में भी क्षमादान की अनन्य शक्ति शामिल है।
- 2. 'ईश्वर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य वाद' और 'कीहर सिंह बनाम भारत संघ वाद' में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 72 के अंतर्गत दया याचिकाओं पर निर्णय लेते समय केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह मानने की कोई बाध्यता नहीं होती है, बल्कि राष्ट्रपति अपने व्यक्तिगत विवेक (Discretionary Power) के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं।
- 3. 'एतवार सिंह बनाम हरियाणा राज्य' तथा 'शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014)' मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका के निपटान में अत्यधिक और अयुक्तियुक्त विलंब (Delay) होने पर मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है, क्योंकि त्वरित न्याय का अधिकार और मानवीय गरिमा अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।
- 4. राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पूरी तरह से वर्जित है और इसके किसी भी आदेश को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, भले ही राष्ट्रपति का निर्णय दुर्भावनापूर्ण, भेदभावपूर्ण या अप्रासंगिक आधारों पर आधारित हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति राज्यपाल की तुलना में अधिक व्यापक है; राष्ट्रपति मृत्युदंड को पूरी तरह से क्षमा (Pardon) कर सकता है और सैन्य न्यायालय (Court-martial) के दंड के विरुद्ध भी राहत दे सकता है, जबकि राज्यपाल को यह दोनों शक्तियाँ प्राप्त नहीं हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि राष्ट्रपति अपनी इस शक्ति का प्रयोग केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता के अनुसार ही करता है, वह स्वतंत्र रूप से व्यक्तिगत विवेक का उपयोग नहीं करता। कथन 3 सही है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने माना है कि दया याचिका के निपटान में असाधारण और अयुक्तियुक्त देरी होने पर अनुच्छेद 21 के तहत मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है। कथन 4 गलत है क्योंकि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की न्यायिक समीक्षा सीमित आधारों पर (जैसे दुर्भावना, मनमानापन या अप्रासंगिक आधार) की जा सकती है। अधिक जानने के लिए हमारे भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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अनुच्छेद 44 क्या है?
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भारतीय संविधान के भाग-I के अंतर्गत संघ एवं उसके राज्य क्षेत्रों (Articles 1-4) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा 'ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे', संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है, जबकि अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद किसी मौजूदा राज्य के क्षेत्र को बढ़ाने, घटाने, उसका नाम बदलने या उसकी सीमा में परिवर्तन करने से संबंधित कानून केवल राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत कर सकती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 4 के यह स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के अधीन नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना या मौजूदा राज्यों के पुनर्गठन के लिए बनाए गए कानून को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाएगा, जिसका अर्थ है कि ऐसे कानून साधारण बहुमत से ही पारित किए जा सकते हैं।
3. वर्ष 1960 के प्रसिद्ध 'बेरूबारी यूनियन मामले' (Berubari Union Case) में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि भारतीय भू-भाग के किसी हिस्से को किसी अन्य देश को सौंपने (Cession of territory) के लिए अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद की साधारण विधायी शक्ति पर्याप्त है और इसके लिए संविधान में संशोधन करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के वैधिक स्वरूप, उसमें निहित आदर्शों के क्रम तथा न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्शों को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया है, जबकि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के आदर्श को रूसी क्रांति (1917) से लिया गया है।
2. 'केशवानंद भारती वाद' (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और न्यायपालिका द्वारा इसे प्रवर्तनीय (Justiciable) बनाया जा सकता है, अर्थात् इसके किसी भी उपबंध के उल्लंघन पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की जा सकती है।
3. प्रस्तावना में उल्लिखित 'बंधुता' (Fraternity) का उद्देश्य व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता को सुनिश्चित करना है, और 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा इसमें 'अखंडता' शब्द जोड़े जाने से पूर्व मूल प्रस्तावना में केवल 'राष्ट्र की एकता' शब्द का ही उल्लेख था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और संसद की विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 5 के अनुसार, संविधान के प्रारंभ पर प्रत्येक वह व्यक्ति भारत का नागरिक था जिसका अधिवास भारत के राज्यक्षेत्र में था और जो भारत के राज्यक्षेत्र में जन्मा था या जिसके माता-पिता में से कोई एक भारत के राज्यक्षेत्र में जन्मा था, अथवा जो ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले कम से कम पाँच वर्ष तक भारत के राज्यक्षेत्र में साधारणतया निवासी रहा था।
2. अनुच्छेद 8 के अनुसार, भारत से बाहर रहने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकारों का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत यदि कोई व्यक्ति या उसके माता-पिता में से कोई एक अथवा दादा-दादी या नाना-दादी में से कोई एक अविभाजित भारत में जन्मा था और वह भारत से बाहर किसी देश में निवास कर रहा हो, तो वह भारत का नागरिक बन सकता है, बशर्ते उसने भारत के डोमिनियन की सरकार द्वारा निर्धारित फॉर्म और प्रक्रिया के अनुसार भारत के राजनयिक या कौंसलिया प्रतिनिधि के पास नागरिकता के लिए पंजीकरण करा लिया हो, चाहे वह स्वतंत्रता से पहले हो या बाद में।
3. अनुच्छेद 7 के तहत पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकारों का नियमन किया गया है, जिसके अनुसार 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान के राज्यक्षेत्र को प्रव्रजन करने वाला कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं समझा जाएगा, भले ही वह बाद में पुनर्वास के परमिट के आधार पर भारत लौट आया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत पारित विभिन्न अधिनियमों और उनके प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, तथा इसी अधिनियम के तहत वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक कर दिया गया; राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) की स्थापना की गई, जबकि वाणिज्यिक मामलों के लिए 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' (Court of Directors) को बनाए रखा गया।
3. चार्टर अधिनियम, 1833 ने बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बना दिया और देश की प्रथम बार विधि निर्माण संबंधी शक्तियों का केंद्रीकरण करते हुए बंबई और मद्रास के गवर्नरों की विधि बनाने की विधायी शक्तियों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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