पियाजे के अनुसार, विकास की पहली अवस्था (जन्म से लगभग 2 वर्ष आयु) के दौरान बच्चा सबसे बेहतर सीखता है:
विस्तृत व्याख्या एवं समाधान
सही उत्तर: विकल्प C (इंद्रियों के प्रयोग और गामक क्रियाओं द्वारा)
1. प्रस्तावना: जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (Cognitive Development Theory)
स्विट्जरलैंड के प्रसिद्ध विकासात्मक मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे (Jean Piaget) ने बालकों के मानसिक एवं संज्ञानात्मक विकास को समझने के लिए एक युगांतरकारी सिद्धांत प्रस्तुत किया। पियाजे के अनुसार बच्चे 'नन्हे वैज्ञानिक' (Little Scientists) होते हैं, जो पर्यावरण के साथ सक्रिय अंतःक्रिया (Active Exploration) करके अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं करते हैं। पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार गुणात्मक रूप से भिन्न अवस्थाओं में विभाजित किया है, जिनमें सर्वप्रथम अवस्था संवेदी-पेशीय अवस्था (Sensorimotor Stage) है, जो जन्म से लेकर लगभग 2 वर्ष की आयु तक चलती है।
2. संवेदी-पेशीय अवस्था (Sensorimotor Stage) की मूल प्रकृति
इस अवस्था के नाम से ही स्पष्ट है—'संवेदी' (Sensory) अर्थात् ज्ञानेंद्रियाँ और 'पेशीय' (Motor) अर्थात् शारीरिक गतिविधियाँ। जीवन के प्रारंभिक दो वर्षों में शिशु के पास अमूर्त चिंतन या औपचारिक भाषा नहीं होती; अतः उसके सीखने और संसार को समझने का एकमात्र माध्यम उसकी इंद्रियाँ और शारीरिक गतियाँ होती हैं:
- इंद्रियाँ ही ज्ञान का प्राथमिक स्रोत हैं: देखना (दृष्टि), सुनना (श्रवण), चखना (स्वाद), सूंघना (गंध) और स्पर्श करना ही शिशु के प्राथमिक संज्ञानात्मक उपकरण होते हैं। शिशु वस्तुओं को मुँह में डालकर, छूकर, हिलाकर या गिराकर उनके भौतिक गुणों का अन्वेषण करता है।
- सहज क्रियाओं से ऐच्छिक क्रियाओं की ओर (Reflexes to Intentional Actions): जन्म के समय शिशु चूसने (sucking), पकड़ने (grasping) जैसी सहज और अनैच्छिक क्रियाएं करता है। धीरे-धीरे वह इन क्रियाओं को समन्वित करना सीखता है (जैसे—झुनझुने को पकड़कर हिलाना ताकि आवाज़ उत्पन्न हो)।
- क्रिया द्वारा विचार (Action-based Thinking): इस अवस्था में बालक के विचार उसकी शारीरिक गतिविधियों से अलग नहीं होते। वह जो कुछ भी करता है, उसी के माध्यम से सोचता है।
3. वस्तु स्थायित्व (Object Permanence): इस अवस्था की सबसे प्रमुख उपलब्धि
संवेदी-पेशीय अवस्था के उत्तरार्ध में (लगभग 8 से 12 महीने के बीच) शिशु 'वस्तु स्थायित्व' (Object Permanence) की संकल्पना अर्जित करता है:
- शुरुआती महीनों में शिशु के लिए "जो दृष्टि से ओझल है, उसका अस्तित्व भी नहीं है" (Out of sight, out of mind)। यदि खिलौना चादर के नीचे छिपा दिया जाए, तो वह उसे नहीं ढूँढता।
- परंतु लगभग 8-9 माह का होते-होते बालक यह समझने लगता है कि वस्तुएं तब भी अस्तित्व में रहती हैं जब वे प्रत्यक्ष रूप से आँखों के सामने नहीं होतीं। यह बालक के संज्ञानात्मक विकास में स्मृति और मानसिक निरूपण (Mental Representation) की पहली महत्वपूर्ण नींव है।
4. पियाजे की चार संज्ञानात्मक अवस्थाओं का तुलनात्मक अवलोकन
| अवस्था (Stage) | आयु वर्ग | सीखने का मुख्य माध्यम एवं विशेषता |
|---|---|---|
| 1. संवेदी-पेशीय (Sensorimotor) | जन्म से 2 वर्ष | इंद्रिय अनुभव, गामक क्रियाएं, वस्तु स्थायित्व का उद्भव। |
| 2. पूर्व-संक्रियात्मक (Pre-operational) | 2 से 7 वर्ष | प्रतीकात्मक खेल, भाषा का विकास, आत्मकेंद्रित सोच (Egocentrism)। |
| 3. मूर्त-संक्रियात्मक (Concrete Operational) | 7 से 11 वर्ष | मूर्त वस्तुओं पर तार्किक चिंतन, संरक्षण (Conservation), वर्गीकरण। |
| 4. अमूर्त-संक्रियात्मक (Formal Operational) | 11 वर्ष और उससे अधिक | परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक चिंतन, अमूर्त तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण। |
5. अन्य विकल्पों का तार्किक खंडन
- विकल्प A (अमूर्त तरीके से चिंतन): अमूर्त और दार्शनिक चिंतन पियाजे की अंतिम अवस्था यानी औपचारिक/अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage - 11 वर्ष के बाद) की विशेषता है।
- विकल्प B (भाषा के अनुप्रयोग द्वारा): भाषा का व्यवस्थित और प्रतीकात्मक उपयोग पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational Stage - 2 से 7 वर्ष) में विकसित होता है। जन्म से 2 वर्ष तक भाषा अत्यंत सीमित या अनुपस्थित होती है।
- विकल्प D (निष्क्रिय शब्दों को समझने द्वारा): पियाजे निष्क्रिय रटंत प्रणाली के पूर्ण विरोधी थे; उनका सिद्धांत सक्रिय अन्वेषण पर आधारित है।
6. शैक्षणिक एवं परीक्षा के लिए निष्कर्ष
CTET और TET परीक्षाओं के लिए यह समझना अनिवार्य है कि जन्म से 2 वर्ष के बच्चों के लिए दृश्य, श्रव्य और स्पर्श-आधारित खेल सामग्री (जैसे रंग-बिरंगे खिलौने, बनावटी आकृतियाँ) ही सीखने का सर्वोत्तम साधन हैं, क्योंकि इस आयु में ज्ञानेंद्रियाँ ही बालक के शिक्षक और मार्गदर्शक होती हैं।