History of India
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मध्यकालीन भारत के इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों के वैचारिक विकास, प्रमुख संतों तथा उनके दार्शनिक सिद्धांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. दक्षिण भारत के अलवार (वैष्णव) और नयनार (शैव) संतों ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी, और बारहवीं शताब्दी में रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन का प्रतिपादन करते हुए ब्रह्म को सर्वोच्च सत्ता तथा जीव और जगत को उसके वास्तविक अंश के रूप में स्वीकार किया।
- 2. पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में असम क्षेत्र में वैष्णव भक्ति आंदोलन का प्रचार करने वाले संत श्रीमंत शंकरदेव ने 'एकशरण नाम धर्म' का प्रतिपादन किया, जिसमें भगवान कृष्ण या विष्णु की एकरूपता पर बल देते हुए मूर्तिपूजा के स्थान पर पवित्र नामों के कीर्तन को सर्वोपरि माना गया।
- 3. सूफियों के 'चिश्ती सिलसिला' के प्रसिद्ध संत शेख निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे और सुल्तानों से मिलने वाले शाही अनुदानों तथा जागीरों को सहर्ष स्वीकार कर अपनी खानकाह का विस्तार किया था।
- 4. सूफियों के 'सुहरावर्दी सिलसिला' के संतों (जैसे शेख बहाउद्दीन जकारिया) ने चिश्ती संतों के विपरीत राजकीय संरक्षण और राजनीतिक सत्ता से दूरी बनाए रखने की नीति का पूर्ण त्याग किया और राज्य के उच्च पदों तथा धन-संपत्ति को स्वीकार करते हुए इस्लाम के नियमों का कठोरता से पालन किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि दक्षिण भारत के अलवार और नयनार संतों ने भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाया तथा रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन का प्रतिपादन किया। कथन 2 सही है क्योंकि असम में श्रीमंत शंकरदेव ने 'एकशरण नाम धर्म' की स्थापना की जो कृष्ण भक्ति और नाम-कीर्तन पर आधारित था। कथन 3 गलत है क्योंकि शेख निजामुद्दीन औलिया और अन्य चिश्ती संतों ने सुल्तानों की राजनीति और राजकीय अनुदानों (मदद-ए-माश) से हमेशा दूरी बनाए रखी, जबकि सूहरावर्दी संतों ने शाही संरक्षण स्वीकार किया था। कथन 4 सही है क्योंकि सुहरावर्दी सिलसिले के संतों ने राजनीतिक सत्ता और राजकीय सहायता लेने में कोई परहेज नहीं किया। इस विषय के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, गुप्तचर तंत्र और सम्राट अशोक के…
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान बिहार के विभिन्न…
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों - स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी - के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा लागू 'स्थाई बंदोबस्त' (Permanent Settlement) के तहत जमींदारों को भूमि का पूर्ण स्वामी मान लिया गया, जिन्हें ब्रिटिश सरकार को निर्धारित राजस्व का 10/11 भाग देना होता था, जबकि 1/11 भाग उनके प्रशासनिक व्यय और लाभ के रूप में सुरक्षित रहता था।
2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मद्रास तथा बॉम्बे प्रेसीडेंसी में मुख्य रूप से लागू 'रयतवारी व्यवस्था' में बिचौलियों (जमींदारों) को समाप्त कर सीधे किसानों (रयतों) को भू-स्वामी माना गया, किंतु राजस्व की दर इतनी अत्यधिक थी कि अकाल या फसल खराब होने पर भी किसानों को कर चुकाने के लिए साहूकारों के जाल में फंसना पड़ता था।
3. उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत भू-राजस्व के आकलन और संग्रह के लिए व्यक्तिगत किसानों या जमींदारों के बजाय संपूर्ण गाँव या 'महाल' (गाँव के समूह) को एक इकाई माना गया, जिसके लिए पूरे ग्राम समुदाय को सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाया गया था।
4. ब्रिटिश भारत के कुल भू-भाग के क्षेत्रफल के संदर्भ में 'रयतवारी व्यवस्था' सर्वाधिक बड़े भू-भाग (लगभग 51%) पर लागू की गई थी, जबकि स्थाई बंदोबस्त लगभग 19% और महालवारी व्यवस्था लगभग 30% भू-भाग पर लागू थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रारंभिक विकास, दार्शनिक मान्यताओं तथा उनके ऐतिहासिक संदर्भों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ (आदिनाथ) का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है, जबकि जैन परंपरा के अनुसार महावीर स्वामी से पहले पार्श्वनाथ ने चार महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह) का प्रतिपादन किया था, जिसमें महावीर स्वामी ने पाँचवें महाव्रत के रूप में 'ब्रह्मचर्य' को जोड़ा था।
2. बौद्ध धर्म के इतिहास में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में कालाशोक के संरक्षण में हुआ था, जिसमें बौद्ध संघ अंतिम रूप से दो संप्रदायों - 'स्थविरवाद' (थेलवाद) और 'महासाहिक' (महासंघिक) में विभाजित हो गया था।
3. जैन दर्शन 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद या सप्तभंगी नय) का प्रतिपादन करता है, जिसके अनुसार सत्य के अनेक पहलू होते हैं और ज्ञान की सापेक्षता के कारण किसी भी वस्तु के संबंध में एकांगी निर्णय नहीं लिया जा सकता।
4. महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश मुख्य रूप से उस समय की जनभाषा 'पाली' में दिए, जबकि महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए 'अर्धमागधी' (प्राकृत) भाषा को अपनाया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वैदिक काल और वैदिक साहित्य की विभिन्न संस्थाओं, आर्थिक गतिविधियों तथा दार्शनिक प्रवृत्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ऋग्वैदिक काल में सभा और समिति नामक दो प्रमुख लोक संस्थाएँ थीं, जिनमें 'सभा' मुख्य रूप से अभिजात वर्ग या बुजुर्गों की संस्था थी, जबकि 'समिति' एक सामान्य लोक सभा थी जिसमें संपूर्ण जन (कबीला) अपने राजा (रज्जन) के चयन और नीति-निर्धारण के लिए भाग लेता था।
2. उत्तर वैदिक काल में 'गोत्र' व्यवस्था की संस्थागत रूप से स्थापना हुई, जिसका शाब्दिक अर्थ वह स्थान था जहाँ समूचे कुल का गोधन पाला जाता था, किंतु आगे चलकर यह एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न होने वाले परिवारों के समूह के अर्थ में रूढ़ हो गई।
3. वैदिक साहित्य में प्रयुक्त 'निशक' और 'शतमान' शब्द शुरुआती दौर में सोने के आभूषणों या विनिमय के माप के रूप में प्रयुक्त होते थे, किंतु उत्तर वैदिक काल के अंत तक आते-आते ये एक प्रकार की विधिवत मानकीकृत मुद्रा (सिक्कों) के रूप में प्रचलन में आ गए थे।
4. वैदिक दर्शन के षड्दर्शन (छह प्रणालियों) में से 'सांख्य दर्शन' के प्रणेता महर्षि कपिल थे, जो यह मानते थे कि इस सृष्टि की रचना ईश्वर की इच्छा से नहीं बल्कि 'प्रकृति' और 'पुरुष' के संयोग से हुई है, और इसमें वेदों की सर्वोच्चता को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के आर्थिक और प्रशासनिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ब्रिटिश भू-राजस्व प्रणालियों (विशेषकर रयतवारी और महालवारी व्यवस्था) ने पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को तोड़ दिया, जिससे किसानों पर भारी कर का बोझ पड़ा और वे साहूकारों तथा महाजनों के चंगुल में फंसकर कर्ज के स्थायी जाल में उलझ गए।
2. ब्रिटिश मुक्त व्यापार नीति और औद्योगीकरण के प्रभावों के कारण भारत के पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों का तेजी से पतन हुआ, जिससे बुनकर और कारीगर बेरोजगार होकर कृषि पर निर्भर होने के लिए बाध्य हो गए।
3. लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत सिद्धांत' (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) नीति के अंतर्गत केवल सतारा, नागपुर और झांसी का ही विलय नहीं किया गया, बल्कि अवध का विलय भी उत्तराधिकारी के अभाव में इसी नीति के तहत किया गया था, जिससे अवध की जनता और सैनिकों में भारी आर्थिक व राजनीतिक रोष उत्पन्न हुआ।
4. इनाम आयोग (Inam Commission) की स्थापना बंबई प्रेसीडेंसी में इसलिए की गई थी ताकि जागीरदारों और इनामदारों की उन कर-मुक्त जमीनों की जांच की जा सके जिनके पास स्वामित्व के वैध दस्तावेज नहीं थे, जिसके परिणामस्वरूप हजारों जागीरों को जब्त कर लिया गया और कुलीन वर्ग में असंतोष फैल गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
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महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
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