History of India
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मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, गुप्तचर तंत्र और सम्राट अशोक के अभिलेखीय साक्ष्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में केंद्रीय प्रशासन के विभिन्न विभागों के अध्यक्षों का वर्णन मिलता है, जिसमें 'संनिधातृ' राजकीय कोषागार और भंडारगृह का मुख्य संरक्षक होता था, जबकि 'समाहर्त्ता' राजस्व संग्रह और वार्षिक बजट तैयार करने का प्रमुख अधिकारी था।
- 2. मौर्य साम्राज्य में गुप्तचर विभाग को 'महामात्यसर्प' कहा जाता था, और गुप्तचरों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था - 'संस्थ्रा' (जो एक ही स्थान पर रहकर कार्य करते थे) और 'संचारा' (जो देश भर में घूमकर सूचनाएँ एकत्रित करते थे)।
- 3. अशोक के धम्म महामात्रों की नियुक्ति उसके शासनकाल के 14वें वर्ष में की गई थी, जिनका मुख्य कार्य विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच धार्मिक सहिष्णुता का प्रसार करना और कैदियों के जीवन की स्थितियों में सुधार कर उनके दंड को कम करना या मुक्त कराना था।
- 4. अशोक के सारनाथ स्तंभ लेख में 'schism' (संघ भेद) रोकने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिसमें बौद्ध संघ में फूट डालने वाले भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए श्वेत वस्त्र पहनकर संघ से बाहर निकाले जाने का कड़ा दंड निर्धारित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के अनुसार 'संनिधातृ' कोषागार और भंडारगृह का अधिकारी था तथा 'समाहर्त्ता' संपूर्ण राज्य के राजस्व संग्रह, आय-व्यय और बजट के निर्धारण के लिए उत्तरदायी था। कथन 2 सही है, मौर्य काल में गुप्तचरों को 'गूढ़पुरुष' कहा जाता था और वे 'संस्था' (एक स्थान पर स्थिर) तथा 'संचारा' (भ्रमणशील) दो प्रमुख श्रेणियों में बंटे थे। कथन 3 सही है, अशोक ने अपने राज्यभिषेक के 13वें वर्ष के बाद धम्म महामात्रों की नियुक्ति की थी जिनका उद्देश्य सामाजिक सौहार्द और कैदियों के कल्याण से जुड़े कार्य करना था। कथन 4 गलत है क्योंकि संघ भेद को रोकने (Schism Edict) से संबंधित निर्देश 'कौशाम्बी' और 'सांची' के लघु स्तंभ लेखों में मिलते हैं, न कि सारनाथ स्तंभ लेख में; सारनाथ लेख मुख्य रूप से मौर्य सम्राट की प्रशासनिक चेतावनी और राज्य की अखंडता से संबंधित है। मौर्यकालीन प्रशासनिक संरचना और राजनीतिक इतिहास की अधिक जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रारंभिक विकास, दार्शनिक मान्यताओं तथा उनके ऐतिहासिक संदर्भों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ (आदिनाथ) का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है, जबकि जैन परंपरा के अनुसार महावीर स्वामी से पहले पार्श्वनाथ ने चार महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह) का प्रतिपादन किया था, जिसमें महावीर स्वामी ने पाँचवें महाव्रत के रूप में 'ब्रह्मचर्य' को जोड़ा था।
2. बौद्ध धर्म के इतिहास में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में कालाशोक के संरक्षण में हुआ था, जिसमें बौद्ध संघ अंतिम रूप से दो संप्रदायों - 'स्थविरवाद' (थेलवाद) और 'महासाहिक' (महासंघिक) में विभाजित हो गया था।
3. जैन दर्शन 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद या सप्तभंगी नय) का प्रतिपादन करता है, जिसके अनुसार सत्य के अनेक पहलू होते हैं और ज्ञान की सापेक्षता के कारण किसी भी वस्तु के संबंध में एकांगी निर्णय नहीं लिया जा सकता।
4. महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश मुख्य रूप से उस समय की जनभाषा 'पाली' में दिए, जबकि महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए 'अर्धमागधी' (प्राकृत) भाषा को अपनाया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य की विभिन्न दार्शनिक प्रवृत्तियों, आर्थिक गतिविधियों तथा संस्थागत विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ऋग्वैदिक काल में लोहे के व्यापक प्रयोग (जिसे 'कृष्ण अयस' कहा गया है) के साक्ष्य मिलते हैं, जिसके कारण इस काल के लोग बड़े पैमाने पर लोहे के हथियार और कृषि उपकरण बनाने में सक्षम थे।
2. शतपथ ब्राह्मण में कृषि की विभिन्न अवस्थाओं जैसे जुताई, बुवाई, कटाई और मड़ाई का विस्तृत विवरण मिलता है, तथा इसी ग्रंथ में विदेह माधव की कथा वर्णित है जिससे आर्य संस्कृति के सदाानीरा (गंडक नदी) तक विस्तार की जानकारी मिलती है।
3. उत्तर वैदिक काल में 'गोत्र' संस्था का उद्भव हुआ, जिसका शाब्दिक अर्थ वह स्थान था जहाँ समूचे कुल का गोधन पाला जाता था, किंतु आगे चलकर यह एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न होने वाले परिवारों के समूह के अर्थ में रूढ़ हो गई।
4. वैदिक साहित्य में प्रयुक्त 'दुहितृ' शब्द का शाब्दिक अर्थ गाय दुहने वाली पुत्री होता था, जो इस बात का संकेत देता है कि प्रारंभिक वैदिक समाज में महिलाओं को आर्थिक उत्पादन और पशुपालन के कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका प्राप्त थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान बिहार के विभिन्न क्षेत्रों (पटना, दानापुर, आरा, मुजफ्फरपुर और छपरा) में हुए घटनाक्रमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पटना में 3 जुलाई 1857 को हुए विद्रोह का नेतृत्व पीर अली खान नामक एक पुस्तक विक्रेता ने किया था, जिसे कमिश्नर विलियम टेलर के आदेशानुसार गिरफ्तार कर सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई थी।
2. दानापुर छावनी (Danapur Cantonment) के 7वीं, 8वीं और 40वीं रेजिमेंट के भारतीय सैनिकों ने 25 जुलाई 1857 को विद्रोह कर दिया और सोन नदी पार कर आरा में बाबू वीर कुंवर सिंह की सेना से जा मिले थे।
3. मुजफ्फरपुर और छपरा में यूरोपीय अधिकारियों के विरुद्ध हुए असंतोष के दौरान ब्रिटिश शासन ने तुरंत मार्शल लॉ लागू कर दिया था, और तिरहुत के कमिश्नर विलियम टेलर ने अपनी कूटनीतिक चालों से दानापुर के विद्रोह को रोकने में पूर्ण सफलता प्राप्त की थी।
4. आरा पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद वीर कुंवर सिंह ने ब्रिटिश सेनापति कैप्टन डनबर की सहायता के लिए आई ब्रिटिश टुकड़ी को बिहिया के जंगलों में बुरी तरह पराजित किया था।
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वैदिक काल और वैदिक साहित्य की विभिन्न संस्थाओं, आर्थिक गतिविधियों तथा दार्शनिक प्रवृत्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ऋग्वैदिक काल में सभा और समिति नामक दो प्रमुख लोक संस्थाएँ थीं, जिनमें 'सभा' मुख्य रूप से अभिजात वर्ग या बुजुर्गों की संस्था थी, जबकि 'समिति' एक सामान्य लोक सभा थी जिसमें संपूर्ण जन (कबीला) अपने राजा (रज्जन) के चयन और नीति-निर्धारण के लिए भाग लेता था।
2. उत्तर वैदिक काल में 'गोत्र' व्यवस्था की संस्थागत रूप से स्थापना हुई, जिसका शाब्दिक अर्थ वह स्थान था जहाँ समूचे कुल का गोधन पाला जाता था, किंतु आगे चलकर यह एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न होने वाले परिवारों के समूह के अर्थ में रूढ़ हो गई।
3. वैदिक साहित्य में प्रयुक्त 'निशक' और 'शतमान' शब्द शुरुआती दौर में सोने के आभूषणों या विनिमय के माप के रूप में प्रयुक्त होते थे, किंतु उत्तर वैदिक काल के अंत तक आते-आते ये एक प्रकार की विधिवत मानकीकृत मुद्रा (सिक्कों) के रूप में प्रचलन में आ गए थे।
4. वैदिक दर्शन के षड्दर्शन (छह प्रणालियों) में से 'सांख्य दर्शन' के प्रणेता महर्षि कपिल थे, जो यह मानते थे कि इस सृष्टि की रचना ईश्वर की इच्छा से नहीं बल्कि 'प्रकृति' और 'पुरुष' के संयोग से हुई है, और इसमें वेदों की सर्वोच्चता को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया गया था।
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मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
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महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
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