History of India
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वैदिक सभ्यता और वैदिक साहित्य की विभिन्न दार्शनिक प्रवृत्तियों, आर्थिक गतिविधियों तथा संस्थागत विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ऋग्वैदिक काल में लोहे के व्यापक प्रयोग (जिसे 'कृष्ण अयस' कहा गया है) के साक्ष्य मिलते हैं, जिसके कारण इस काल के लोग बड़े पैमाने पर लोहे के हथियार और कृषि उपकरण बनाने में सक्षम थे।
- 2. शतपथ ब्राह्मण में कृषि की विभिन्न अवस्थाओं जैसे जुताई, बुवाई, कटाई और मड़ाई का विस्तृत विवरण मिलता है, तथा इसी ग्रंथ में विदेह माधव की कथा वर्णित है जिससे आर्य संस्कृति के सदाानीरा (गंडक नदी) तक विस्तार की जानकारी मिलती है।
- 3. उत्तर वैदिक काल में 'गोत्र' संस्था का उद्भव हुआ, जिसका शाब्दिक अर्थ वह स्थान था जहाँ समूचे कुल का गोधन पाला जाता था, किंतु आगे चलकर यह एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न होने वाले परिवारों के समूह के अर्थ में रूढ़ हो गई।
- 4. वैदिक साहित्य में प्रयुक्त 'दुहितृ' शब्द का शाब्दिक अर्थ गाय दुहने वाली पुत्री होता था, जो इस बात का संकेत देता है कि प्रारंभिक वैदिक समाज में महिलाओं को आर्थिक उत्पादन और पशुपालन के कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका प्राप्त थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि ऋग्वैदिक काल के लोगों को लोहे (कृष्ण अयस) का ज्ञान नहीं था; लोहे का व्यापक प्रयोग उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व के बाद) में शुरू हुआ था। कथन 2, 3 और 4 पूरी तरह सत्य हैं। शतपथ ब्राह्मण में कृषि की चारों अवस्थाओं (जुताई, बुवाई, कटाई, मड़ाई) का उल्लेख है और विदेह माधव की कथा द्वारा आर्यों के पूर्व की ओर सदाानीरा (गंडक) नदी तक विस्तार का वर्णन मिलता है। गोत्र और दुहितृ शब्दों के ऐतिहासिक संदर्भ भी उत्तर वैदिक और ऋग्वैदिक समाज की वास्तविक स्थिति को दर्शाते हैं। अधिक जानकारी के लिए देखें विकिपीडिया संदर्भ।
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मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्था, गुप्तचर तंत्र तथा…
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छठी शताब्दी ईसा पूर्व में 'सोलह महाजनपदों' के उदय और मगध साम्राज्य के उत्कर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अंगुत्तर निकाय और जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में छठी शताब्दी ईसा पूर्व के सोलह महाजनपदों की सूची मिलती है, जिसमें वज्जी और मल्ल संघ राजतंत्र के स्थान पर गणतंत्रात्मक शासन प्रणालियों के उदाहरण थे।
2. मगध साम्राज्य के उत्थान में उसकी भौगोलिक स्थिति का महत्वपूर्ण योगदान था; राजगीर (गिरिव्रज) का पांच पहाड़ियों से घिरा होना और बाद में पाटलिपुत्र का जल-दुर्ग (जलदुर्ग) के रूप में रणनीतिक महत्व होना इसकी सुरक्षा को अजय बनाता था।
3. हरयक वंश के संस्थापक बिम्बिसार (श्रेणिक) ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए वैवाहिक संबंधों की नीति अपनाई, जिसके तहत उसने कौशल, मल्ल और वज्जी राजवंशों की राजकुमारियों से विवाह कर अपनी स्थिति अत्यंत मजबूत कर ली थी।
4. महापद्मनंद ने नंद वंश की स्थापना कर 'एकराट' और 'सर्वक्षत्रान्तक' (क्षत्रत्रियों का नाश करने वाला) की उपाधि धारण की, और उसके शासनकाल में मगध का साम्राज्य उत्तर में व्यास नदी से लेकर दक्षिण में गोदावरी घाटी तक फैल गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजनीतिक कारणों के अंतर्गत लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत सिद्धांत' (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) नीति के तहत सतारा, नागपुर और झांसी के अतिरिक्त अवध का विलय उत्तराधिकारी के अभाव में नहीं बल्कि वर्ष 1856 में कुशासन (Maladministration) का आरोप लगाकर किया गया था, जिससे अवध की सेना और जनता में भारी रोष उत्पन्न हुआ।
2. सामाजिक और धार्मिक कारणों में वर्ष 1850 में पारित 'धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) ने हिंदू से ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले व्यक्तियों को अपने पैतृक संपत्ति के अधिकारों से वंचित करने की पुरानी परंपरा को समाप्त कर दिया, जिससे रूढ़िवादी भारतीयों में ब्रिटिश सरकार के प्रति गहरी आशंका फैल गई।
3. आर्थिक कारणों के संदर्भ में ब्रिटिश मुक्त व्यापार नीति और एकतरफा शुल्क नीतियों के दुष्प्रभावों ने पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को तबाह कर दिया, तथा भू-राजस्व की कठोर प्रणालियों के कारण किसान भारी कर्ज के जाल में फंस गए।
4. सैन्य कारणों में वर्ष 1856 में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पारित 'सामान्य सेवा Enlistment अधिनियम' (General Service Enlistment Act) ने बंगाल सेना के सभी नए भारतीय सैनिकों के लिए समुद्र पार (Overseas service) जाकर सेवा देना अनिवार्य कर दिया, जिसे उस समय की रूढ़िवादी हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जातिभ्रष्ट होने का प्रतीक माना गया था।
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों - स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी - के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा लागू 'स्थाई बंदोबस्त' (Permanent Settlement) के तहत जमींदारों को भूमि का पूर्ण स्वामी मान लिया गया, जिन्हें ब्रिटिश सरकार को निर्धारित राजस्व का 10/11 भाग देना होता था, जबकि 1/11 भाग उनके प्रशासनिक व्यय और लाभ के रूप में सुरक्षित रहता था।
2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मद्रास तथा बॉम्बे प्रेसीडेंसी में मुख्य रूप से लागू 'रयतवारी व्यवस्था' में बिचौलियों (जमींदारों) को समाप्त कर सीधे किसानों (रयतों) को भू-स्वामी माना गया, किंतु राजस्व की दर इतनी अत्यधिक थी कि अकाल या फसल खराब होने पर भी किसानों को कर चुकाने के लिए साहूकारों के जाल में फंसना पड़ता था।
3. उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत भू-राजस्व के आकलन और संग्रह के लिए व्यक्तिगत किसानों या जमींदारों के बजाय संपूर्ण गाँव या 'महाल' (गाँव के समूह) को एक इकाई माना गया, जिसके लिए पूरे ग्राम समुदाय को सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाया गया था।
4. ब्रिटिश भारत के कुल भू-भाग के क्षेत्रफल के संदर्भ में 'रयतवारी व्यवस्था' सर्वाधिक बड़े भू-भाग (लगभग 51%) पर लागू की गई थी, जबकि स्थाई बंदोबस्त लगभग 19% और महालवारी व्यवस्था लगभग 30% भू-भाग पर लागू थी।
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मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, गुप्तचर तंत्र और सम्राट अशोक के अभिलेखीय साक्ष्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में केंद्रीय प्रशासन के विभिन्न विभागों के अध्यक्षों का वर्णन मिलता है, जिसमें 'संनिधातृ' राजकीय कोषागार और भंडारगृह का मुख्य संरक्षक होता था, जबकि 'समाहर्त्ता' राजस्व संग्रह और वार्षिक बजट तैयार करने का प्रमुख अधिकारी था।
2. मौर्य साम्राज्य में गुप्तचर विभाग को 'महामात्यसर्प' कहा जाता था, और गुप्तचरों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था - 'संस्थ्रा' (जो एक ही स्थान पर रहकर कार्य करते थे) और 'संचारा' (जो देश भर में घूमकर सूचनाएँ एकत्रित करते थे)।
3. अशोक के धम्म महामात्रों की नियुक्ति उसके शासनकाल के 14वें वर्ष में की गई थी, जिनका मुख्य कार्य विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच धार्मिक सहिष्णुता का प्रसार करना और कैदियों के जीवन की स्थितियों में सुधार कर उनके दंड को कम करना या मुक्त कराना था।
4. अशोक के सारनाथ स्तंभ लेख में 'schism' (संघ भेद) रोकने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिसमें बौद्ध संघ में फूट डालने वाले भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए श्वेत वस्त्र पहनकर संघ से बाहर निकाले जाने का कड़ा दंड निर्धारित किया गया था।
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मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
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महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
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