History of India
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गदर पार्टी और क्रांतिकारी आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. गदर पार्टी की स्थापना वर्ष 1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर में सोहन सिंह भकना के नेतृत्व में की गई थी और इसके संस्थापक अध्यक्ष लाला हरदयाल थे, जिन्होंने 'युगांतर गदर' नामक साप्ताहिक पत्र के माध्यम से औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष शुरू किया था।
- 2. प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ होने पर गदर पार्टी के सदस्यों ने 'हॉर्डन योजना' के तहत भारत वापस आकर ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाहियों को बगावत के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया, जिसे 'गदर षड्यंत्र' के नाम से जाना जाता है।
- 3. चंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का पुनर्गठन करते हुए वर्ष 1928 में इसका नाम बदलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) कर दिया था, और इसमें समाजवाद को आधिकारिक रूप से अपने राजनीतिक लक्ष्य के रूप में शामिल किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: गदर पार्टी की स्थापना 1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में सोहन सिंह भकना (अध्यक्ष) और लाला हरदयाल (प्रमुख प्रस्तावक एवं विचारक) द्वारा की गई थी। इसका मुख्य पत्र 'गदर' था। कथन 2 गलत है क्योंकि इसे 'गदर षड्यंत्र' (Ghadr Conspiracy) कहा जाता है, न कि 'हॉर्डन योजना'। कथन 3 सही है: सितंबर 1928 में फिरोजशाह कोटला मैदान (दिल्ली) में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में HRA का नाम बदलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) रखा गया था, जिसमें भगत सिंह की वैचारिक भूमिका प्रमुख थी। इस आंदोलन के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल और गरम दल के काल तथा उनके वैचारिक एवं राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता के दौरान नरमपंथियों और चरमपंथियों के बीच बंगाल विभाजन और 'स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन' के पूरे देश में प्रसार को लेकर तीव्र वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ गए थे।
2. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर हुए विवाद के पश्चात कांग्रेस का औपचारिक विभाजन हुआ, जिसमें नरमपंथियों ने 'स्वराज' को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया, जबकि गरमदलियों ने ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत औपनिवेशिक स्वराज्य (Colonial Self-Government) की मांग पर बल दिया।
3. सूरत विभाजन के उपरांत ब्रिटिश सरकार ने 'दमन और फुसलाओ' (Repression and Conciliation) की नीति अपनाई, जिसके तहत जहाँ एक ओर बाल गंगाधर तिलक जैसे गरमपंथी नेताओं को राजद्रोह के आरोप में मांडले जेल भेज दिया गया, वहीं दूसरी ओर मार्ले-मिंटो सुधार (1909) के माध्यम से नरमपंथियों को संतुष्ट करने का प्रयास किया गया।
4. वर्ष 1916 के लखनऊ अधिवेशन में एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक के प्रयासों से कांग्रेस के दोनों गुट पुनः एक हो गए, किंतु इस अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा मुस्लिम लीग की पृथक् निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) की मांग को स्वीकार करने का विरोध नरमपंथियों ने नहीं बल्कि केवल गरमपंथी नेताओं ने किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित मराठा साम्राज्य और उसकी प्रशासनिक-सैन्य व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. शिवाजी महाराज के केंद्रीय प्रशासन में 'अष्टप्रधान' नामक मंत्रिपरिषद थी, जिसमें प्रत्येक मंत्री सीधे छत्रपति के प्रति उत्तरदायी होता था और इनमें से अधिकांश मंत्रियों (पंडितराव और न्यायाधीश को छोड़कर) को समय-समय पर सैन्य अभियानों का नेतृत्व भी करना पड़ता था।
2. मराठा प्रशासन में 'चौथ' और 'सरदेशमुखी' केवल स्वराज्य (मराठा गृह प्रदेश) के भीतर किसानों से वसूले जाने वाले आंतरिक भू-राजस्व कर थे, जिनका मराठा साम्राज्य के बाहर के मुगल क्षेत्रों से कोई संबंध नहीं था।
3. शिवाजी ने अपनी सेना में वंशानुगत सरदारों (सिग्नेचर जागीरदारों) की प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया था और सैनिकों को लूट के माल के बजाय नियमित नकद वेतन देने की परंपरा के साथ-साथ 'दाग' एवं 'हुलिया' जैसी अनुशासनात्मक प्रथाओं को कड़ाई से लागू किया था।
4. शिवाजी के उत्तराधिकारियों के काल में पेशवाओं के उदय के दौरान, 'संगोला की संधि' (1750) के परिणामस्वरूप छत्रपति की स्थिति केवल एक नाममात्र का शासक बनकर रह गई और समस्त वास्तविक प्रशासनिक एवं राजनैतिक शक्ति पेशवा के हाथों में केंद्रित हो गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे द्वारा संचालित सैन्य अभियानों, रणनीतिक गतिविधियों तथा ब्रिटिश सेना के विरुद्ध संघर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मार्च 1858 में सर ह्यूरोज के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना द्वारा झांसी के दुर्तिपूर्ण घेरा डाले जाने के बाद, रानी लक्ष्मीबाई ने कड़े संघर्ष के बीच झांसी की रक्षा की और अंततः तात्या टोपे की संयुक्त सेना के साथ मिलकर कालपी के मैदान में अंग्रेजों के विरुद्ध एक प्रभावी सैन्य मोर्चा खोला।
2. तात्या टोपे ने ग्वालियर के सिंधिया शासक (जयाजीराव सिंधिया) की सेना को अपने पक्ष में करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की, जिसके परिणामस्वरूप ग्वालियर पर विद्रोही ताकतों का अधिकार हो गया और नाना साहब को पेशवा घोषित कर एक नई अंतरिम प्रशासनिक सरकार का गठन किया गया।
3. ग्वालियर के पतन और रानी लक्ष्मीबाई की शहादत (जून 1858) के उपरांत तात्या टोपे ने मध्य भारत और राजस्थान के जंगलों में guerilla (छापामार) युद्ध का सफल संचालन करते हुए लंबे समय तक अंग्रेजों को उलझाए रखा, और अंततः उनके एक विश्वासी मित्र मानसिंह द्वारा विश्वासघात किए जाने के कारण उन्हें ब्रिटिश सेना द्वारा पकड़ लिया गया।
4. रानी लक्ष्मीबाई के कालपी से ग्वालियर प्रस्थान करने के पूर्व, तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेना ने ब्रिटिश जनरल कॉलीन कैंपबेल को कानपुर के समीप निर्णायक रूप से पराजित कर दिया था और कानपुर पर पुनः अधिकार कर लिया था, जिस पर अंग्रेजों का दोबारा कभी नियंत्रण नहीं हो सका।
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'नरम दल' और 'गरम दल' के वैचारिक संघर्ष तथा उनके राजनीतिक कार्यक्रमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कांग्रेस के वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता के दौरान ही नरमपंथियों और चरमपंथियों के बीच बंगाल के विभाजन को लेकर असहमतियाँ पूरी तरह सतह पर आ गई थीं, जहाँ चरमपंथी चाहते थे कि स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का प्रसार केवल बंगाल तक ही सीमित न रखकर पूरे देश में किया जाए।
2. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के निर्वाचन को लेकर हुए विवाद के परिणामस्वरूप कांग्रेस का औपचारिक विभाजन हुआ, जिसमें नरमपंथियों ने ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत औपनिवेशिक स्वराज्य (Colonial Self-Government) को अपना लक्ष्य बनाए रखा, जबकि गरमदलियों ने पूर्ण स्वराज की मांग पर बल दिया।
3. सूरत विभाजन के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने नरमपंथियों की राजनीतिक निष्ठा का लाभ उठाने के लिए 'दमन और फुसलाओ' (Repression and Conciliation) की नीति अपनाई, जिसके अंतर्गत एक ओर तिलक जैसे गरमपंथी नेताओं को राजद्रोह के आरोप में लंबी सजा दी गई, तो दूसरी ओर मार्ley-मिंटो सुधार (1909) के माध्यम से नरमपंथियों को संतुष्ट करने का प्रयास किया गया।
4. वर्ष 1916 के लखनऊ अधिवेशन में एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक के अथक प्रयासों से कांग्रेस के दोनों गुट पुनः एक हो गए, किंतु इस समझौते के तहत मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस द्वारा पृथक् निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) को स्वीकार किए जाने का विरोध केवल नरमपंथी नेताओं ने ही किया था, जबकि गरमदलियों ने इसका पूर्ण समर्थन किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
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महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
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